भारतकोश
प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

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तृतीयोऽध्यायः ५७ लंबचोरस शुभ गर्भगृह— “दारुजे वलभीना तु आयतं च न दुष्येत् । प्रशस्त सर्वकृत्येषु चतुरस्रं शुभप्रदम् ॥” अप० सू० १२६ दारुजादि (लकड़ी के बने हुए) और वलभी (स्त्रीलिंग) जाति के प्रासाद में गर्भगृह लंबा हो तो दोष नही लगता है । बाकी समस्त जाति के प्रासादों मे समचोरस गर्भगृह बनाना, सब कार्यों में प्रशंसनीय और शुभ है । स्तम्भ और मंडोवर का समन्वय— कुम्भकेन समा कुम्भी स्तम्भप्रान्तेन तूद्गमः । भरण्या भरणीं शीर्षं कपोताल्या समं भवेत् ॥३४॥ पेटके¹ कूटच्छाद्यस्य कुर्यात् पटस्य पेटकम् । मंडोवर का कुम्भ और स्तंभ की कुम्भी, स्तंभ का मथाला और मंडोवर का उद्गम, स्तभ की भरणी और मडोवर की भरणी, मंडोवर की कपोताली और स्तंभ की शिरावटी, ये सब समसूत्र मे रखने चाहिये और पाट के पेटा भाग तक छज्जा की नमन (छज्जा नमता) रखनी चाहिये । गर्भगृह के उदय का मान और गुम्बज— सषडंशः सपादः स्यात् सार्धो गर्भस्य विस्तरात् ॥३५॥ वृहद्देवालये पट्ट-पेटान्तं हि त्रिधोदयः । भजेदष्टभिरेकांशा कुम्भी स्तम्भोऽद्ध्र्पञ्चभिः ॥३६॥ अर्द्धेन भरणी शीर्ष-मेकं पट्टस्तु सार्धकः । व्यासार्धेन करोटः स्याद् दर्दरी त्रिषमा शुभा ॥३७॥ इति गुर्भगृहोदयप्रमाणम् । गर्भगृह (गभारे) के विस्तार मे विस्तार का षष्ठांश युक्त सवाया अथवा डेढा गर्भगृह का उदय रखे । यह गभारे के तल से पाट के पेटा भाग तक गर्भगृह के उदय का तीन प्रकार का मान हुआ । (अपराजित पृच्छा सू० १२६ श्लो० ५ मे गभारे का उदय पौने दुगुणा तक रखने (१) 'अधस्तात्' प्रा० ८