भारतकोश
प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

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५८ प्रासादमण्डने को कहा है ) जो उदयमान आया हो, उसका आठ भाग करें, उनमें से एक भाग की कुम्भी, साढ़े पांच भाग का स्तंभ, आधे भाग की भरणी और एक भाग की शिरावटी बनावें। इसके ऊपर डेढ भाग का केवाल ( पाट ) रखें। गर्भगृह के विस्तार से आधा करोट ( गूम्बज ) का उदय रखना चाहिये, उसमें दर्दरी का थर विषम संख्या में रखें ।।३५ से ३७॥ उदुम्बर (देहली) की ऊँचाई— मूलकर्णस्य सूत्रेण कुम्भेनोदुम्बरः समः । तदधः पञ्चरत्नानि स्थापयेच्छिल्पिपूजया ॥३८॥ प्रासाद के कोने के समसूत्र में उदुम्बर ( देहली ) बनावें । यह कुम्भा के उदय के बराबर ऊंचाई मे रखें। इसको स्थापना करते समय नीचे पचरत्न रखे और शिल्पियों का सम्मान करे ॥३८॥ उदुम्बर की रचना— द्वारव्यासत्रिभागेन मध्ये मन्दारको भवेत् । वृत्तं मन्दारकं कुर्याद् मृणालं पद्मसंयुतम् ॥३६॥ जाड्यकुम्भः कणाली च कीर्तिवक्त्रद्वयं तथा । उदुम्बरस्य पार्श्वे च शाखायास्तलरूपकम् ॥४०॥ द्वार के विस्तार का अर्थात् देहली का तीन भाग करें। उनमे से एक भाग का मध्य मे मंदारक बनाये। यह अर्धचंद्र के आकार वाला गोल और पद्मपत्र युक्त बनाना चाहिये। बदुम्बर की ऊंचाई के अर्धभाग में जाड्यकुम्भ और कणी, ये दो थर वाली कणपीठ बनावें। मंदारक के दोनों तरफ एक २ भाग का कीर्तिमुख ( ग्रासमुख ) बनावें और उसके बगल में शाखा के तलका रूपक बनावें ॥३६-४०॥ कुभा से हीन उदुम्बर और तल— कुम्भस्यार्द्धे त्रिभागे वा पादे हीन उदुम्बरः । तदर्धे कर्णकं मध्ये पीठान्ते बाह्यभूमिका ॥४१॥ इति उदुम्बर । उदुंबर का उदय कुम्भ के उदय के बराबर रखना चाहिये। परन्तु कम करना चाहे तो कुम्भ के उदय का आधा एक तृतीयांश अथवा चौथा भाग जितना कम कर सकते है। उदय के आधे भाग तक कणपीठ करना और गर्भगृह का तल रखना चाहिये और बाहर के मंडपों के तल पीठ के उदयान्त बराबर रक्खे ॥४१॥