भारतकोश
प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

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५४ प्रासादमण्डने तक सब थर १४४ भाग के मान से बनाकर के पीछे उसके ऊपर मञ्ची आदि थर बनायें जाते है, उनका मान इस प्रकार है— उपरोक्त १४४ भाग के मण्डोवर के खुरासे लेकर भरणी तक के सब थर बना करके उसके ऊपर मंची आठ भाग की, जंघा पचीस भाग की, उद्गम तेरह भाग का और भरणी आठ भाग की बनानी चाहिये । इसके ऊपर शिरावटी केवल, अंतराल और छज्जा, ये चार थर १४४ भाग के मंडोवर के मान का बनावें । फिरसे इस छज्जा के ऊपर सात भाग की मचो, सोलह भाग की जंघा, सात भाग की भरणी, चार भाग की शिरावटी, पांच भाग का पाट और बारह भाग का कूटछाद्य बनावे । यह मेरुमंडोवर सब इच्छित फल देने वाला है। कुम्भा का एक चतुर्थांश भाग जितना सब थरों का निर्गम रक्खे ॥२२४ से २७॥ क्षीरार्णव में कहा है कि—

  • "अस्योदये च कर्त्तव्यं प्रथमं षट्कच्छाद्यकम् । यावत्समोदयः प्राज्ञ ! तावन्मण्डोवरं कृतम् ॥ तथाद्यच्छाद्यसस्थाने द्वे जङ्घे परिकीर्त्तिते । "भवेयुर्द्वादशजङ्घा यावत्तु शतार्धोदये ॥ षड्विधं कूटच्छाद्यं च द्विभूम्योरन्तरे मुने ! । भरण्यूर्ध्वं भवेन्माञ्ची छाद्योर्ध्वं न च मञ्चिका ॥ पुनर्जङ्घा प्रदातव्या यावद् द्वादशसंख्यया । किञ्चित् किञ्चिद् भवेन्न्यूनं कर्तव्यो भूमिकोच्छ्रयः ॥ शतार्द्धोदये माने च महामेरुः प्रदापयेत् ।" अध्याय १०४॥ जितना प्रासाद का उदय हो, उतना ही ऊंचा मंडोवर रक्खें। इस मंडोवर के उदय मे छह छज्जे बनावे। प्रथम छज्जा दो जंघा वाला बनावे । इस प्रकार पचास हाथ के प्रासाद में बारह जंघा और छह छज्जा बनाया जाता है। दो दो भूमि के फासले पर एक २ छज्जा बनाना चाहिये । भरणी के ऊपर मांची रक्खें, किन्तु छज्जा के ऊपर मांची नहीं रखनी चाहिये। नीचे की भूमि से ऊपर की भूमि की ऊंचाई कम कम रखनी चाहिये । यह [चित्र-शीर्षक: सामान्य मण्डोवर नक्शा] महामेरु मंडोवर पचास हाथ के प्रासाद के लिये बनाना चाहिये ।