प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
पृष्ठ 90, कुल 278 में से
संदर्भ में पढ़ेंतृतीयोऽध्यायः ५३ में नागरी जंघा, लाटदेश मे लाटी जंघा, दक्षिण देश में द्राविडी जंघा और सारे देश मे वैराटी जंघा प्रसिद्ध है । "उद्गमः पञ्चदशांशैः कपिश्रासैरसङ्कृतः ॥ भरणी वसुभागा तु शिरावटी पञ्चेव च । तदूर्ध्वं पञ्चभिः पट्टं कपोतालिवसुस्मृता ॥ द्विसार्धमन्तःपत्रं च त्रिदशं कूटच्छाद्यकम् । निर्गम वसुभागे तु मेर्वादीनामतः शृणु ॥" पंद्रह भाग का उद्गम बनावे, एवं उसमे वन्दरो के रूप बनावे । आठ भाग की भरणी, पांच भाग की शिरावटी, उसके ऊपर पांच भाग का पाट, आठ भाग का केवाल, ढाई भाग का अंतरपत्र और तेरह भाग का छज्जा का उदय रखना चाहिये । छज्जा का निर्गम आठ भाग रखे । मेरु मंडोवर— मेरुमण्डोवरे मञ्ची भरण्यूर्ध्वेऽष्टभागिका । पञ्चविंशतिका जङ्घा उद्गमश्च त्रयोदश ॥२४॥ अष्टांशा भरणी शेषं पूर्ववत् कल्पयेत् सुधीः । सप्तभागा भवेन्मञ्ची कूटच्छाद्यस्य मस्तके ॥२५॥ षोडशांशा पुनर्जङ्घा भरणी सप्तभागिका । शिरावटी चतुर्भागा पट्टः स्यात् पञ्चभागिकः ॥२६॥ सूर्यांशैः कूटच्छाद्यं च सर्वकामफलप्रदम् । कुम्भकस्य युगांशेन स्थावराणां प्रवेशकः ॥२७॥ इति मेरुमंडोवरः । जिस मंडोवर मे एकसे अधिक जंघा होवे, उसको मेरुमडोवर कहते है । उसमें भरणी के ऊपर खुर, कुम्भ, कलश, अंतराल और केवाल, ये प्रथम के पांच थर नहीं बनाये जाते, किन्तु मञ्ची आदि सब थर बनायं जाते है । इसलिये प्रथम खुरा से लेकर भरणी
रेखाचित्र-विवरण (चित्रान्तर्गत पाठ)
- मेरुमण्डोवर भाग २४९
- [अधः से ऊर्ध्व क्रम]:
- खुरक
- कुंभ (२० १/२)
- कलश (४)
- अन्तराल (२)
- कपोतली (७)
- मंचिका (३)
- जंघा (२५)
- उद्गम (१३)
- भरणी (८)
- मंचिका (७)
- जंघा (१६)
- उद्गम
- भरणी (७)
- शिरावटी (४)
- कपोतली (७)
- पाटन
- कूटछाद्य (१२)
- जंघा
- भरणी (७)
- शिरावटी
- पाटन
- छाद्य