भारतकोश
प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

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चतुर्थोऽध्यायः ७७ शिखर दोष कारक होता है और पांच भाग से कम रखे तो शिखर शोभायमान नही होता ॥१२॥ ज्ञानरत्नकोष में लीखा है कि-- "चतुरस्रीकृते क्षेत्रे दशधा प्रतिभाजिते । द्वौ द्वौ भागौ तु कर्त्तव्यौ कोणे कोणे न संशयः ॥ भद्रं भागत्रयं कार्यं सार्धभागं तु चानुगम् । व्यासमानं सपादं च उच्छ्रयेण तु कारयेत् ॥ स्कन्धं षड्भागिकं कार्यं तस्योर्ध्वं नवधा भवेत् । चतुर्भागायतं कोणं त्रिभिर्भागैस्तु चानुगम् ॥ भद्रपूर्णं तु द्विभिर्भागै-स्ततस्तु साधयेत् कलाम् ॥" प्रासाद के समचोरस क्षेत्र का दस भाग करे । उनमे से दो दो भाग के दो कोण, तीन भाग का भद्र और डेढ़ २ भाग के दो प्रतिकर्ण बनावे । शिखर विस्तार से ऊंचाई में सवाया रक्खें और उसका स्कंध छह भाग विस्तार में रक्खें । इसका नव भाग करके चार भाग के दोनों कोण, तीन भाग के दोनों प्रतिकर्ण और पूरा भद्र दो भाग का रक्खे । पीछे रेखा बनावें । कलारेखा की साधना-- "आदिकोणं द्विधा कृत्य प्रथमं वेदभाजितम् ॥ द्वितीयं तु त्रिभिर्भागै-रेवं सप्तकला भवेत् । उदयं द्व्यष्टभिर्भागैः कृत्वा रेखां समालिखेत् ॥ ऊर्ध्वतिर्यग् भागानां भागे भागे तु लाञ्छयेत् । एवं तु सिध्यते रेखा भद्रे कोणे तथानुगे ॥" एक तरफ के कोण का दो भाग करें। उनमें से प्रथम भाग का चार और दूसरे भाग का २५६ रेखा का नकशा