भारतकोश
प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

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७६ प्रासादमण्डने मूलकर्ण (कोना), रथ, उपरथ आदि प्रासाद के अंग है, उनके ऊपर एक, दो अथवा तीन शृङ्ग अनुक्रम से चढावें। निरंधार (प्रकाश वाला) प्रासाद की मुख्य दीवार पर और सांधार (परिक्रमा वाला) प्रासाद हो तो परिक्रमा की दीवार पर शृङ्गों का क्रम रखें ॥१०॥ उरःशृंग का क्रम- उरुशृङ्गाणि भद्रेस्यु-रेकादिग्रहसंख्यया । त्रयोदशोर्ध्वे सप्ताधो लुप्तानि चोर्ध्वशृङ्गकैः ॥११॥ प्रासाद के भद्र के ऊपर एक से नव तक उरःशृङ्ग चढ़ाये जाते है। शिखर के उदय का तेरह भाग करके उनमें से सात भाग के मान का उरःशृङ्ग बनावें। दूसरा उरःशृङ्ग प्रथम के उरःशृङ्ग का तेरह भाग करके उनमें से सात भाग का बनावें। इस प्रकार ऊपर के उरः शृङ्ग का तेरह भाग करके सात भाग के उदय में नीचे का उरःशृङ्ग रखें ॥११॥ उरुशृंग की रचना शिखर का निर्माण शिखर निर्माण- रेखामूले च दिग्भागं कुर्यादग्रे षडंशकम् । षड्बाह्ये दोषंदं प्रोक्तं पञ्चमध्ये न शोभनम् ॥१२॥ शिखर के नीचे के दोनों कोने के विस्तार का दस भाग करें। उनमें से शिखर के ऊपर के स्कंध का विस्तार छह भाग रखें। इस स्कंध का विस्तार छह भाग से अधिक रखें तो