भारतकोश
प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

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चतुर्थोऽध्यायः ७५ गर्भगृह के बराबर दो भाग करके दीवार की तरफ के अर्धभाग के दस भाग करे, उनमे से दीवार से प्रथम भाग मे पिशाच, दूसरे में राक्षस, तीसरे मे दैत्य, चौथे मे गंधर्व, पांचवे मे यक्ष, छठे में सूर्य, सातवें मे चंडिका, आठवे में विष्णु, नवे मे ब्रह्मा और दसवे मे शिव को स्थापित करे। अग्निपुराण अ० ६७ के मत से पदस्थान— “षड्भिर्विभाजिते गर्भे त्यक्त्वा भागं च पृष्ठतः । स्थापनं पञ्चमांशे च यदि वा वसुभाजिते ॥ स्थापनं सप्तमे भागे प्रतिमासु सुखावहम् ॥” गर्भगृह का छह भाग करे, उनमे से दीवार के पासका एक भाग छोड़ दे, उसके आगे के पांचवे भाग मे सब देवो को स्थापित करे। अथवा गर्भगृह के आठ भाग करके दीवार के पासका एक भाग छोड़ दे, उसके आगे सातवें भाग में सब देवो को स्थापित करना सुखकारक है।* प्रहार थर— छाद्यस्योर्ध्वे प्रहारः स्याच्छृङ्गे शृङ्गे तथैव च । प्रासादशृङ्गशृङ्गेषु अधोभागे तु छाद्यकम् ॥८॥ छज्जा के ऊपर प्रहार का थर बनावें। प्रत्येक शृङ्ग के नीचे प्रहार का थर बनाना चाहिये। उसके नीचे छाद्य ( छज्जा ) बनावे ॥८॥ छाद्यके थरमान— छाद्यं भागद्वयं सार्धं सार्धभागं च पालवम् । मण्डलीकं भागमेकं भागेन तिलकस्तथा ॥६॥ △ छज्जा का उदय दो भाग अथवा डेढ़ ( ढाई ? ) भाग, पालव डेढ़ भाग, मुंडलिक एक भाग और तिलक एक भाग रखना चाहिये ॥६॥ शृंगक्रम— मूलकर्णे रथादौ च एक द्वित्रिक्रमान् न्यसेत् । निरन्धारे मूलभित्तौ सान्धारे भ्रमभित्तिषु ॥१०॥ *विशेष माहिती के लिये स्वय द्वारा अनुवादित 'देवतामूर्ति प्रकरण' ओर 'रूपमण्डन' देखना चाहिये। △ यह श्लोक बहुतसी प्रतो मे नही है।