भारतकोश
प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

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पृष्ठ 115

७८ प्रासादमण्डने तीन भाग करने से सात कला रेखा होती हैं । इसी तरह दूसरी तरफ के कोण की भी सात कला रेखा होती है। ऐसी कुल चौदह कला रेखाओं में दोनों प्रतिकर्ण की दो कला रेखा मिलाने से सोलह कला रेखा होती है । इनके उदय में सोलह २ भाग करने से दोसौ छप्पन कला रेखायें होती है । उदयभेदोद्भू रेखा— सपादं शिखरं कार्यं सकर्णं शिखरोदयम् । सपादकर्णयोर्मध्ये रेखाः स्युः पञ्चविंशतिः ॥१३॥ मूलरेखा के विस्तार से शिखर का उदय सवाया करें । सवाया शिखर में दोनों कोने के मध्य मे पचीस रेखाये है ॥१३॥ सपादकर्णयोर्मध्ये¹ उदये पञ्चविंशतिः । प्रोक्ता रेखाः कलाभेदै-र्वलणे पञ्चविंशतिः ॥१४॥ सवाया उदय वाले शिखर के दोनों कोने के मध्य में पचीस रेखा उदय में होती हैं । कला के भेद से ये शिखर के नमन में पचीस रेखायें है ॥१४॥ कलाभेदोद्भूव रेखा— पञ्चादिनन्दयुग्मान्तं खण्डानि तेष्वनुक्रमात् । अंशवृद्ध्या कलाः कार्या दैर्घ्ये स्कन्धे च तत्समाः ॥१५॥ शिखर के उदय का पांच से लेकर उनतीस खंड करें । उन खंडों में अनुक्रम से एक २ कला उदय मे बढ़ावें । जैसे-प्रथम पांच खंडों में एक से पांच कला, छठे मे छह और सातवें मे सात, इस प्रकार उनतीसवे खंड में उनतीस कला है । उदय मे जितनी कला होवे, उतनी कला संख्या स्कंध मे भी बनाना चाहिये ॥१५॥ अष्टादावष्टषष्ट्यन्तं चतुर्वृद्ध्या च षोडश । दैर्घ्यतुल्याः कलाः स्कन्धे एकहीनांशोऽशोभनम् ॥१६॥ प्रथम समचार की त्रिकखंडों मे आठ २ कला रेखा है । पीछे आगे के प्रत्येक खंड में चार २ कला बढ़ाने से अठारहवें खंड में अड़सठ कला रेखा होती हैं । उदय मे जितनी कला रेखा हो, उतनी स्कंध मे भी बनावे । एक भी कम रक्खे तो शोभायमान नही लगता ॥१६॥ (१) पुनरुक्त मालूम होता है ।