प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
७८ प्रासादमण्डने तीन भाग करने से सात कला रेखा होती हैं । इसी तरह दूसरी तरफ के कोण की भी सात कला रेखा होती है। ऐसी कुल चौदह कला रेखाओं में दोनों प्रतिकर्ण की दो कला रेखा मिलाने से सोलह कला रेखा होती है । इनके उदय में सोलह २ भाग करने से दोसौ छप्पन कला रेखायें होती है । उदयभेदोद्भू रेखा— सपादं शिखरं कार्यं सकर्णं शिखरोदयम् । सपादकर्णयोर्मध्ये रेखाः स्युः पञ्चविंशतिः ॥१३॥ मूलरेखा के विस्तार से शिखर का उदय सवाया करें । सवाया शिखर में दोनों कोने के मध्य मे पचीस रेखाये है ॥१३॥ सपादकर्णयोर्मध्ये¹ उदये पञ्चविंशतिः । प्रोक्ता रेखाः कलाभेदै-र्वलणे पञ्चविंशतिः ॥१४॥ सवाया उदय वाले शिखर के दोनों कोने के मध्य में पचीस रेखा उदय में होती हैं । कला के भेद से ये शिखर के नमन में पचीस रेखायें है ॥१४॥ कलाभेदोद्भूव रेखा— पञ्चादिनन्दयुग्मान्तं खण्डानि तेष्वनुक्रमात् । अंशवृद्ध्या कलाः कार्या दैर्घ्ये स्कन्धे च तत्समाः ॥१५॥ शिखर के उदय का पांच से लेकर उनतीस खंड करें । उन खंडों में अनुक्रम से एक २ कला उदय मे बढ़ावें । जैसे-प्रथम पांच खंडों में एक से पांच कला, छठे मे छह और सातवें मे सात, इस प्रकार उनतीसवे खंड में उनतीस कला है । उदय मे जितनी कला होवे, उतनी कला संख्या स्कंध मे भी बनाना चाहिये ॥१५॥ अष्टादावष्टषष्ट्यन्तं चतुर्वृद्ध्या च षोडश । दैर्घ्यतुल्याः कलाः स्कन्धे एकहीनांशोऽशोभनम् ॥१६॥ प्रथम समचार की त्रिकखंडों मे आठ २ कला रेखा है । पीछे आगे के प्रत्येक खंड में चार २ कला बढ़ाने से अठारहवें खंड में अड़सठ कला रेखा होती हैं । उदय मे जितनी कला रेखा हो, उतनी स्कंध मे भी बनावे । एक भी कम रक्खे तो शोभायमान नही लगता ॥१६॥ (१) पुनरुक्त मालूम होता है ।
चतुर्थोऽध्यायः ७६ रेखाचक्र— ऊर्ध्वा अष्टादशांशाः स्यु-स्तिर्यक्पोडश एव च । चक्रेऽस्मिंश्च भवन्त्येव रेखाणां षट्शरद्वयम् ॥१७॥ शिखर के उदय मे अठारह और तिरछी सोलह रेखा होती है, ऐसा चक्र बनाने से दौसो छप्पन रेखायें होती हैं, ऊपर 'कला रेखा की साधना' पढ़ें ॥१७॥ प्रथम समचार की त्रिखंडा कलारेखा— त्रिखण्डात् खण्डवृद्धिस्च यावदष्टादशैव हि । एकैकांशे कलाष्टौ च समचारस्तु पोडश ॥१८॥ त्रिखंड से लेकर एक २ खंड वढाते हुए अठारह खंड तक बढावे । प्रथम प्रत्येक त्रिखंड मे समचार की आठ २ कला रेखाये है । ऐसे सोलह चार है ॥१८॥ दूसरा सपादचार की त्रिखंडा कलारेखा— द्वितीयप्रथमे खण्डे कलाष्टौ द्वितीये नव । तृतीये दशखण्डेषु शेषेषूर्ध्वेष्वयं क्रमः ॥१९॥ दूसरा सपादचार हो तो प्रथम खंड में आठ, दूसरे खंड मे नव और तीसरे खंड मे दस कला रेखा बनावे । इस प्रकार बाकी के चारो मे भी इसी क्रम रेखा बनावे ॥१९॥ तीसरा सार्द्धचार की त्रिखंडा कलारेखा— अष्टदिक्सूर्यभागैश्च त्रिखण्डा तृतीया भवेत् । अनेन क्रमयोगेन कोष्ठानङ्कैः प्रपूरयेत् ॥२०॥ तीसरा सार्धचार हो तो प्रथम खंड मे आठ, दूसरे खंड में दस और तीसरे खंड मे बारह कलारेखा बनावे । इस क्रम से दूसरे चारो के कोठे को अंको से पूर्ण करे ॥२०॥ सोलह प्रकार के चार— 'समः सपादः सार्द्धंश्च पादोनो द्विगुणस्तथा । द्विगुणश्च सपादो द्वौ सार्ध. पादोनकस्त्रयः ॥
- श्लोक १८ से २० तक का खुलासा वार आशय समझने के लिये देखो चार के भेदो से त्रिखडा की रेखा और कला जानने का यत्र ।
८० प्रासादमण्डने त्रिखंडा की रेखा और कला—
| नम्बर | चार के नाम | रेखा का नाम | प्रथम खंडकी कला | द्वितीय खंडकी कला | तृतीय खंडकी कला | कला की कुल संख्या |
|---|---|---|---|---|---|---|
| १ | समचार<br>८×१=८ | शशिनी | ८ | ८ | ८ | २४ |
| २ | सपादचार<br>८×१।=१० | शीतला | ८ | ९ | १० | २७ |
| ३ | सार्धचार<br>८×१॥=१२ | सौम्या | ८ | १० | १२ | ३० |
| ४ | पादोनद्वयचार<br>८×१।॥=१४ | शान्ता | ८ | ११ | १४ | ३३ |
| ५ | द्विगुणचार<br>८×२=१६ | मनोरमा | ८ | १२ | १६ | ३६ |
| ६ | सपाद द्विगुणचार<br>८×२।=१८ | शुभा | ८ | १३ | १८ | ३९ |
| ७ | सार्धद्विगुणचार<br>८×२॥=२० | मनोभवा | ८ | १४ | २० | ४२ |
| ८ | पादोनत्रयचार<br>८×२।॥=२२ | वीरा | ८ | १५ | २२ | ४५ |
| ९ | त्रिगुणचार<br>८×३=२४ | कुमुदा | ८ | १६ | २४ | ४८ |
| १० | सपाद त्रिगुणचार<br>८×३।=२६ | पद्मशेखरा | ८ | १७ | २६ | ५१ |
| ११ | सार्द्धं त्रिगुणचार<br>८×३॥=२८ | ललिता | ८ | १८ | २८ | ५४ |
| १२ | पादोन चतुष्क<br>८×३।॥=३० | लीलावती | ८ | १९ | ३० | ५७ |
| १३ | चतुर्गुणचार<br>८×४=३२ | त्रिदशा | ८ | २० | ३२ | ६० |
| १४ | सपाद चतुष्कचार<br>८×४।=३४ | पूर्णमण्डला | ८ | २१ | ३४ | ६३ |
| १५ | सार्धचतुष्कचार<br>८×४॥=३६ | पूर्णभद्रा | ८ | २२ | ३६ | ६६ |
| १६ | पादोन पंचकचार<br>८×४।॥=३८ | भद्राङ्गी | ८ | २३ | ३८ | ६९ |
| इस प्रकार चतुःखंडादिकी कला रेखाएं चार के भेदों से समझना चाहिये । |
चतुर्थोऽध्यायः ८१ त्रिगुणोऽथ सपादोऽसौ सार्धः पादोनवेदकः । चतुर्गुणः सपादोऽसौ सार्धः पादोनपञ्चकः ॥ इति षोडशधा चारं त्रिखण्डाद्यासु लक्षयेत् ॥" अप० सू० १३६ त्रिखंडादि खंडो मे सोलह कलाचारों के भेदों से सोलह २ रेखाये उत्पन्न होती हैं। ये सोलह कलाचार इस प्रकार है—प्रथम सम ( बराबर ) चार, दूसरा सपाद ( सवाया ) चार, तीसरा सार्द्ध ( डेढा ) चार, चौथा पौने दो गुणा, पांचवा दो गुणा, छठ्ठा सवा दो गुणा, सातवां ढाईगुणा, आठवा पौने तीनगुणा, नवा तीनगुणा, दसवा सवा तीनगुणा, ग्यारहवा साढे तीनगुणा, बारहवा पौने चार गुणा, तेरहवां चार गुणा, चौदहवां सवा चार गुणा, पंद्रहवा साढे चार गुणा, और सोलहवां पौने पांच गुणा है। रेखासंख्या— रेखाणां जायते संख्या षट्पञ्चाशच्छतद्वयम् । दैन्ये भवन्ति यावन्त्यः कलाः स्कन्धेऽपि तत्समाः ॥२१॥ इति रेखानिर्णयः । सोलह प्रकार के कलाचारो के भेदों से प्रत्येक त्रिखंडादि मे सोलह २ रेखाये उत्पन्न होती है। इसलिये रेखाग्रो की कुल संख्या दोसौ छप्पन होती हैं। शिखर के उदय मे जितनी कलारेखा उत्पन्न हो, उतनी स्कध मे भी बनानी चाहिये ॥२१॥ मंडोवर और शिखर का उदयमान— विंशद्भिर्विभजेद् भागैः शिलातः कलशान्तकम् । मण्डोवरोऽष्टसार्धाष्ट-नवांशैः शिखरं¹ परम् ॥२२॥ खरशिला से लेकर कलश के अंत भाग तक के उदय के बीस भाग करे। उनमे से आठ, साढे आठ अथवा नव भाग का मंडोवर का उदय रखे, इसी क्रम से ज्येष्ठ, मध्यम और कनिष्ठ मान के मंडोवर का उदय होता है। ऐसा अप० सू० १३८ मे भी कहा है। बाकी जो भाग रहे, उतने उदय का शिखर बनावे ॥२२॥ शिखर विधान— रेखामूलस्य विस्तारात्² पद्मकोशं समालिखेत् । चतुर्गुणेन सूत्रेण सपादः शिखरोदयः ॥२३॥ (१) 'शिखरोदयम्' । (२) 'विस्तारे' । प्रा० ११
८२ प्रासादमण्डने मूलरेखा के विस्तार से चार गुणा सूत्र से दोनों कोने के मूल बिंदु से दो गोल बनावे। जिसके दोनों गोल के स्पर्श से कमल की पंखुड़ो जैसी आकृति वाला पद्मकोश बन जाता है। उसमें दोनों कोने के मध्य विस्तार से सवाया शिखर का उदय रक्खे ॥२३॥* ग्रीवा, आमलसार और कलशका मान— स्कन्धकोशान्तरे सप्त-भक्ते ग्रीवा तु भागतः । सार्ध आमलसारश्च पद्मच्छत्रं³ तु सार्धकम् ॥२४॥ त्रिभाग उच्चकलशो द्विभागस्तस्य विस्तरः । प्रासादस्याष्टमांशेन पृथुत्वं कलशाएडकम् ॥२५॥ ऊपर के लिखे अनुसार सवाया शिखर का उदय करने के बाद जो पद्मकोश का उदय बाकी रहता है, उसमे ग्रीवा, आमलसार और कलश बनावे। जैसे—शिखर के स्कध से लेकर पद्मकोश के अन्त्य बिन्दु तक के उदय का सात भाग करें । उनमे से एक भाग की ग्रीवा, डेढ़ भाग का आमलसार, डेढ़ भाग का पद्मच्छत्र ( चंद्रिका ) और तीन भाग का कलश बनावे । द्विभाग के विस्तार वाले कलश का बीजोरा बनावें । कलश के अंडा का विस्तार प्रासाद के आठवे भाग का रक्खें ॥२४-२५॥ शुकनासका उदय— छाद्यतः स्कन्धपर्यन्त-मेकविंशतिभाजिते । अङ्कदिग्रुद्रसूर्यांशै-र्विश्वांशैस्तस्य चोच्छ्रतिः ॥२६॥ छज्जा से लेकर शिखर के स्कंध तक के उदय का इक्कीस भाग करें । इनमे से नव, दस, ग्यारह, बारह अथवा तेरह भाग तक शुकनास का उदय रक्खे ॥२६॥ सिंहस्थान— शुकनासस्य संस्थाने छाद्यो पञ्चधा मतम् । एकत्रिपुञ्चसप्ताङ्क-सिंहस्थानानि कल्पयेत् ॥२७॥ (३) 'पत्र' ।
- शिल्पियो की मान्यता है कि—मूलकर्ण (पायचा) से शिखर का उदय सवाया करना हो तो पायचे के विस्तार से चार गुना सूत्र से, डेढा करना हो तो पाच गुना सूत्र से, पौने दुगुना करना हो तो पौने सात गुना सूत्र से और १ ३/८ उदय करना हो तो साढे चार गुना सूत्र से मूलकर्ण के दोनो विन्दु से दो गोल बनाने से कमल के पखुडी जैसा आकार बन जाता हैं। इसमे अपने इष्ट मान के उदय में शिखर का स्कंध और बाकी रहे उदय मे आमलसार और कलश आदि बनावें ।
चतुर्थोऽध्यायः ८३ छज्जा के ऊपर शुकनास का उदय पांच प्रकार का माना है। उनमे से शुकनास के उदय का जो मान आया हो उसका नव भाग करे। इनमे से एक, तीन, पाच, सात अथवा नव, इन पाच भागो मे से किसी भी भाग मे सिंह स्थान की कल्पना कर सकते हैं। अर्थात् उस स्थान पर सिंह रखा जाता है ॥२७॥ *कपिली (कोली) का स्थान— द्वारस्य दक्षिणे वामे कपिली षड्विधा मता । तदूर्ध्वे शुकनासा स्यात् सैव प्रासादनासिका ॥२८॥ गर्भगृह के द्वार के आर दाहिनी और बायी ओर छह प्रकार से कोली बनावे। उसकी ऊंचाई मे शुकनास बनावे, यह प्रासाद की नासिका है ॥२८॥ कपिली का मान— प्रासादो दशभागश्च द्वित्रिवेदांशसम्मितः । प्रासादार्धेन पादेन त्रिभागेनाथ निर्मिता ॥२६॥ प्रासाद के विस्तार का दस भाग करे, उनमे से दो, तीन अथवा चार भाग की, तथा प्रासाद के मान से आधे, चौथे अथवा तीसरे भाग के मान की, ऐसे छह प्रकार के मान से कपिली (कोली) बनाने का विधान है ॥२६॥ छह प्रकार की कपिली— ''अञ्चिता कुञ्चिता शस्या त्रिधोदितक्रमांगताः । मध्यस्था भ्रमा सद्भ्रमा षट्कोल्यः परिकीर्त्तिताः ॥ प्रासादे दशधा भक्ते भूमिसौमा विचक्षण ! । अञ्चिता च द्विभागा स्यात् त्रिभागा कुञ्चिता तथा ॥ शस्या चैवं चतुर्भागा त्रिधा चोक्तक्रमांगताः । ... .... ... ... .... ..." ॥ प्रासादपादमध्यस्था भ्रमा सप्तत्रिभागतः । अर्द्ध तु सद्भ्रमा कार्या प्रासादस्य प्रमाणतः ॥" अप० सू० १३८
- गर्भगृह के द्वार के मडप को कोली मडप कहते हैं। उसके छज्जा के ऊपर शुकनास के दोनो तरफ शिखर के आकार का महप किया जाता है, उसको आधुनिक शिल्पीयो प्रासादपुत्र कहते हैं। उसका नाम कपिली अथवा कोली है ।
८४ प्रासादमण्डने अंचिता, कुञ्चिता, शस्या, मध्यस्था, भ्रमा और सभ्रमा ये छह प्रकार के कोली के नाम है। प्रासाद के विस्तार का दस भाग करके, उनमें से दो भाग की कोली बनावे, उसका नाम अंचिता, तीन भाग वाली कोली का नाम कुञ्चिता और चार भाग वाली कोली का नाम शस्या है। तथा प्रासाद के विस्तार मान के चौथे भाग की कोली बनावें, उसका नाम मध्यस्था, तीसरे भाग वालो कोली का नाम भ्रमा और आधे भाग वाली कोली का नाम सभ्रमा है। प्रासाद के अंडक और आभूषण— शृङ्गोरुशृङ्गं ग्रप्रत्यङ्गं गणयेदण्डकानि¹ च । तवङ्गं तिलकं कर्णं कुर्यात् प्रासादभूषणम् ॥३०॥ शिखर, उरुशृङ्ग, प्रत्यग और शृङ्ग, ये प्रासाद के अंडक माने जाते हैं, ऐसा विद्वान् लोग मानते है। तथा तवग, तिलक और सिंहकर्ण ये प्रासाद के आभूषण माने जाते है ॥३०॥ शिखर के नमन का विभाग-- दशांशे शिखरे मूले अग्रेतननवांशके । सार्द्धांशकौ रथौ कर्णौ द्वौ शेषं भद्रमिष्यते ॥३१॥ शिखर के मूल में दस भाग और ऊपर स्कंध के नव भाग करें, उनमें से डेढ़ २ भाग के दो प्रतिरथ और दो दो भाग के दोनों कोने बनावे। बाकी जो तीन भाग नीचे और दो भाग ऊपर बचे है, उस मानका भद्र बनावे ॥३१॥ आमलसार का मान-- रथयोरुभयोर्मध्ये वृत्तमामलसारकम् । उच्छ्रायो विस्तारार्धेन चतुर्भागैर्विभाजयेत् ॥३२॥ ग्रीवा चामलसारश्च पादोना च सपादकः । चन्द्रिका भागमानेन भागेनामलसारिका ॥३३॥ दोनो प्रतिरथ के मध्य विस्तार के मान का गोल आमलसार बनाना चाहिये। इसकी ऊंचाई विस्तार से आधी रक्खें। ऊंचाई का चार भाग करें। उनमे से पौने भाग की ग्रीवा ( गला ), सवा भाग का आमलसार, एक भाग की चन्द्रिका और एक भाग की आमलसारिका बनावे ॥३२-३३॥ (१) 'मण्डकान् गणयेत् सुधी:'।
चतुर्थोऽध्यायः ८५ प्रकारान्तर से आमलसार का मान-- "स्कन्धः षड्भागको ज्ञेयः सप्ताशामलसारकः । क्षेत्रमष्टविंशभागे--रुच्छ्रये च तदर्धतः ॥ ग्रीवा भागत्रयं कार्या अण्डक. पञ्चभागकः । त्रिभागा चन्द्रिका चैव तथैवामलसारिका ॥ निर्गमे षट्सार्धभागो भवेदामलसारिका । चन्द्रिका द्विसार्धभागा अण्डकः पञ्च एव च ॥" ज्ञान प्र० दी० श्र० ६ क्षीरार्णवमते आमलकारक मान स्वमते आमलसारका मान स्कंध का विस्तार छह भाग और आमलसार का विस्तार सात भाग रक्खे। आमलसार के विस्तार का अठाईस भाग और ऊंचाई का चौदह भाग करे। उदय मे तीन भाग का गला, पाच भाग का अंडक, तीन भाग की चन्द्रिका और तीन भाग की आमलसारिका रक्खे। आमलसार के मध्य गर्म से विस्तार मे साढे छह भाग निकलती आमलसारिका, इससे ढाई भाग निकलती चंद्रिका और इससे पाच भाग निकलता अंडक (आमलसार) रखना चाहिये। आमलसारकें नीचे शिखरके कोणरूप-- "शिवे तु चैश्वरं रूपं ध्यानमग्नं विचक्षण ! । शिखरकर्णे दातव्यं जिने कुर्याज्जिनेश्वरः ॥” क्षीरार्णवे । शिखर के आमलसार के नीचे और स्कंध के कोने के ऊपर शिवालय हो तो ध्यान मे मग्न ऐसे शिव के रूप तथा जिनालय हो तो जिनदेव के रूप रखे जाते है।
८६ प्रासादमण्डने
सुवर्णपुरुष (प्रासाद पुरुष) का स्थापनक्रम-- घृतपात्रं न्यसेन्मध्ये ताम्रतारं सुवर्णजम् । सौवर्णपुरुषं तत्र तुलीपर्यङ्कशायिनम् ॥३४॥ आमलसार के गर्भ मे घी से भरा हुआ सोना, चांदी अथवा तांबे का कलश सुवर्णपुरुष के पास रखना चाहिये ।* तथा चांदी अथवा चंदन का पलंग रक्खे, उसके ऊपर रेशम की शय्या बिछा करके, उस पर सुवर्णपुरुष को शयन करावें। यह विधि शुभ दिन में वास्तु पूजन करके करनी चाहिये । क्योकि यह प्रासाद का मर्मस्थान ( जीवस्थान ) है ॥३४॥
सुवर्ण पुरुष का मान और उसकी रचना-- प्रमाणं पुरुषस्यार्धा-ऽङ्गुलं कुर्यात् करं प्रति । त्रिपताकं करे वामे हृदिस्थं दक्षिणाम्बुजम्¹ ॥३५॥ प्रासाद पुरुष का प्रमाण प्रासाद के विस्तार के अनुसार प्रत्येक हाथ आधा २ अंगुल बढ़ा करके बनावें । अर्थात् एक हाथ के प्रासाद मे आधा अंगुल, दो हाथ के प्रासाद मे एक अंगुल, तोन हाथ के प्रासाद में डेढ़ अंगुल और चार हाथ के प्रासाद में दो अंगुल, इस प्रकार प्रत्येक हाथ आधा २ अंगुल बढ़ा करके बनावें । इस सुवर्णपुरुष के बांये हाथ में ध्वजा रखकर के यह छाती पर और दाहिना हाथ कमलयुक्त रक्खे ॥३५॥ प्रा० कुबेरपुरुष
अपराजितपृच्छासूत्र १५३ में कहा है कि-- “अथातः सम्प्रवक्ष्यामि पुरुषस्य प्रवेशनम् । न्यसेद् देवालयेष्वेवं जीवस्थानफलं भवेत् ॥ छादनोपप्रवेशेषु शृङ्गमध्येऽथवोपरि । शुकनासावसानेषु वेद्यूर्ध्वे भूमिकान्तरे ॥ मध्यगर्भे विधातव्यो हृदयवरणंको विधिः । हंसतुली ततो कुर्यात् ताम्रपर्यङ्कसंस्थिताम् ॥
- कुछ शिल्पियो का मत है कि-घीसे भरा हुआ सोना, चादी अथवा तांबा के कलश मे सुवर्ण पुरुष को रखकर के, वह कलश पलंग पर रक्खें । (१) 'दक्षिण करम्' ।
चतुर्थोऽध्यायः ८७ शयनं चापि निर्दिष्ट पद्म वै दक्षिणे करे । त्रिताकं करे वामे कारयेद्धृदि सस्थितम् ॥” यह सुवर्णपुरुष देवालय का जीवस्थान है, इसलिये उसको देवालय मे स्थापना करने का स्थान कहता हूँ—यह छज्जा के प्रवेश मे, शिखर के मध्य भाग मे अथवा उसके ऊपर, शुकनास के अन्तिम स्थान मे, वेदी के ऊपर और दो माल के मध्य गर्भ मे स्थापन करना चाहिये । यह हृदयवर्णक (जीव) विधि है । इसको तावे के पलंग के ऊपर रेशम की शय्या बिछा कर, उसके ऊपर शयन कराना चाहिये । उसके दाहिने हाथ मे कमल और बाये हाथ मे ध्वजा रखकर वह हाथ छाती के ऊपर रखना चाहिये । प्रमाणं तस्य वक्ष्यामि प्रासादादौ समस्तके । यावच्छतार्धं हस्तादेः कल्पयेच्च यथाक्रमम् ॥ वृद्धिर्द्धाङ्गुलाद्धस्ते यावन्मेरुं प्रकल्पयेत् । एवविध प्रकर्त्तव्यं सर्वकामफलप्रदम् ॥ हेमजं तारज वापि ताम्रजं वापि भागशः । कलशे चाम्बुपूर्णे तु सौवर्णं पुरुष न्यसेत् ॥ पर्यङ्कस्य चतु र्पत्सु कुम्भाश्चत्वार एव च । हिरण्यनिधिसंयुक्ता आत्ममुद्राभिरङ्किताः ॥ एवमारोपयेद् देवं यथोक्तं वास्तुशासने । तस्य नैव भवेद् दुःखं यावदाभूत सम्प्लवम् ॥” अब सुवर्ण पुरुष का प्रमाण कहता हूँ—एक हाथ से पचास हाथ तक के प्रासाद के लिये प्रत्येक हाथ आधा २ अगुल बढा करके बनावे । यह सोना, चादी अथवा ताबा का बनाकर जलपूर्ण कलश मे स्थापन करे । पीछे उसको पलंग के ऊपर रक्खे । इसके पश्चात् अपने नाम वाली सुवर्णमुद्रा से भरे हुए चार कलश पलंग के चारो पायो के पास रक्खे । इस प्रकार सुवर्णपुरुष को स्थापित करने से जब तक जगत विद्यमान रहे, तब तक किसी प्रकार का दुःख देवालय बधाने वाले को नही होता है । कलश को उत्पत्ति और स्थापना-- क्षीराब्धौ समुत्पन्नं प्रासादस्याग्रजातकम् । माङ्गल्येषु च सर्वेषु कलशं स्थापयेद् बुधः ॥३६॥ जब देवो ने क्षीरसमुद्र का मंथन किया, तब उसमे से चौदह रत्न प्राप्त हुए थे । इन चौदह रत्नो मे एक काम कुम्भ नाम का श्रेष्ठ कलश भी प्राप्त हुआ था । यह प्रासाद के अग्र
८८ प्रासादमण्डने भाग (शिखर) पर और सब मांगलिक स्थानों मे विद्वान् लोग स्थापित करते हैं ॥३६॥ कलश का उदयमान— पूर्वोक्तमानतो ज्येष्ठः षोडशांशाधिको भवेत् । द्वात्रिंशदंशतो¹ मध्यो नवांशोऽभ्युदयं भवेत् ॥३७॥ ग्रीवापीठं भवेद् भागं त्रिभागेनाण्डकं तथा । कर्णिके भागतुल्ये च त्रिभागं बीजपूरकम् ॥३८॥ पूर्वोक्त श्लोक २५ में कलश का जो मान लिखा है, उसका मान में उसका सोलहवां भाग बढावे तो ज्येष्ठ मान का और बत्तीसवां भाग बढ़ावें तो मध्यम मान के कलश का उदय होता है। जो उदय आवे उसका नव भाग करे, उन मे से एक भाग की ग्रीवा और पीठ, तीन भाग का अंडक (कलश का पेट), दोनों कर्णिका (एक छज्जी और एक कणी) एक २ भाग और तीन भाग का बीजोरा उदय मे रक्खें ॥३७-३८॥ कलश का विस्तार मान— एकांशमग्रे द्वौ मूले वह्निवेदांशकर्णिके । ग्रीवा द्वौ पीठमर्द्ध² द्वौ षड्भागं विस्तराण्डकम् ॥३९॥ इति कलशः । बीजोरा के अग्र भाग का विस्तार एक भाग और मूल भाग का विस्तार दो भाग, ऊपर की कणी का विस्तार तीन भाग, नीचे की कणी (छाजली) का विस्तार चार भाग, गला का विस्तार दो भाग, आधी पीठ का विस्तार दो भाग (पूरी पीठ का विस्तार चार भाग) और कलश के पेटका बिस्तार छह भाग है ॥३९॥ १ 'तावदंशोनः कनीयो'
चतुर्थोऽध्यायः ८६ ध्वजादंड रखने का स्थान— प्रासादपृष्ठदेशे तु दक्षिणे तु प्रतिरथे । ध्वजाधारस्तु कर्त्तव्य ईशाने नैऋतेऽथवा ॥४०॥ इति प्रासादस्योर्ध्वलक्षणम् । प्रासाद के शिखर के पिछले भाग मे दाहिने प्रतिरथ मे ध्वजादंड रखने का छिद्रवाला स्थान ध्वजाधार (कलावा) बनावे । यह पूर्वाभिमुख प्रासाद के ईशान कोने मे और पश्चिमा- भिमुख प्रासाद के नैऋत्य कोने मे बनावे ॥४०॥ ध्वजाधार (स्तंभवेध) का स्थान-- "रेखायाः षष्ठमे भागे तदंशे पादवर्जिते । ध्वजाधारस्तु कर्त्तव्यः प्रतिरथे च दक्षिणे ॥" ज्ञान प्र० दी० अ० ६ शिखर की रेखा के उदय का छह भाग करे । उनमे ऊपर के छठे भाग का फिर चार भाग करे, इनमे से नीचे का एक भाग छोड कर, इसके ऊपर के भाग मे दाहिने प्रतिरथ मे ध्वजाधार बनावे अर्थात् रेखा का चौबीस भाग करके ऊपर के बाईसवे भाग मे ध्वजाधार बनावे । अपराजित के मत से स्तंभवेध का स्थान— "रेखाध' (र्घश्च?) त्रिभागोर्ध्वं सूत्रांशे (तदंशे) पादवर्जिते । ध्वजोन्नतिस्तु कर्त्तव्या ईशाने नैऋतेऽथवा ॥ प्रासादपृष्ठदेशे तु प्रतिरथे च दक्षिणे । स्तम्भवेधस्तु कर्त्तव्यो भित्तेरष्टमांश के (भित्याश्च षष्ठमाशके)॥" सूत्र १४४ शिखर की रेखा (कोण) के ऊपर के अर्ध भाग का तीन भाग करे । ऊपर के तीसरे भाग का फिर चार भाग करके नीचे से एक भाग छोड करके उसके ऊपर के भाग में स्तंभवेध बनावे । यह ईशान अथवा नैऋत कोण मे प्रासाद के पिछले भाग मे दाहिने प्रतिरथ मे दीवार के छट्ठे भाग के मान जितना मोटा बनावे । ध्वजाधार की मोटाई और स्तंभिका— "स्तम्भवेधस्तु कर्त्तव्यो भित्त्याश्च षष्ठमाशकः । घण्टोदयप्रमाणेन स्तम्भिकोदयः कारयेत् ॥ घामहस्ताङ्गलविस्तार-स्तस्योर्ध्वं कलशो भवेत् ॥" ज्ञान प्र० दी० अ० ६ प्रा० १२
६० प्रासादमण्डने दीवार के छठे भाग का मोटा स्तंभवेध (ध्वजाधार) बनावे। ध्वजादंड को मजबूत स्थिर रखने के लिये बगल में एक स्तंभिका रखी जाती है। उसका उदय स्तंभवेध से आमलसार का उदय तक रक्खें। उसकी मोटाई प्रासाद के मान से हस्तांगुल (जितने हाथ हो उतने अंगुल) रक्खें और उसके ऊपर कलश रक्खें। ध्वजादंड और स्तंभिका इन दोनों का अच्छी तरह वज्रबंध करें। शिखर का २४ भाग करके २२ वां भाग में ध्वजदंड और स्तंभिका का स्थान— शिखर का छह भाग करके ऊपर के छठे भाग के तीसरे भाग में ध्वजदंड का स्थान— ध्वजादंड का उदयमान— दण्डः कार्यस्तृतीयांशः शिलातः¹ कलशान्तकम् । मध्योऽष्टांशेन हीनोऽसौ ज्येष्ठपादोनः कन्यसः ॥४१॥ १. 'शिलान्तः'
चतुर्थोऽध्यायः ६१ प्रासाद की खरशिला से लेकर कलश के अग्रभाग तक के उदय का तीन भाग करके, इनमे से एक भाग के मान का लंबा ध्वजादंड बनावे। यह ज्येष्ठमान का है। इनमे से आठवा भाग कम करने से मध्यम मान का और चौथा भाग कम करने से कनिष्ठ मान का ध्वजादंड होता है ॥४१॥ ध्वजादंड का दूसरा उदयमान— प्रासादव्यासमानेन² दण्डो ज्येष्ठः प्रकीर्तितः । मध्यो हीनो दशांशेन पञ्चमांशेन कन्यसः ॥४२॥ प्रासाद के विस्तार के बराबर ध्वजादंड की लंबाई रखे, यह ज्येष्ठ मान का ध्वजादंड है । इसमे से दसवा भाग कम करे तो मध्यम मान का और पाचवा भाग कम करे तो कनिष्ठ मान का ध्वजादंड होता है ॥४२॥ ध्वजादंड का तीसरा उदयमान— "मूलरेखाप्रमाणेन ज्येष्ठः स्याद् दण्डसम्भवः । मध्यमो द्वादशांशोनः षडंशोनः कनिष्ठकः ॥" अप० सू० १४४ मूलरेखा (गर्भगृह अथवा शिखर के नीचे के पायचा के विस्तार जितना) के विस्तार मान का लंबा ध्वजाडड बनावे, यह ज्येष्ठ मान का है। उसमे से बारहवां भाग कम करे तो मध्यम और छठा भाग कम करेतो कनिष्ठ मान का ध्वजादंड होता है। विवेक विलास के प्रथम सर्ग के श्लोक १७६ मे स्पष्ट लिखा है कि— "दण्डः प्रकाशे प्रासादे प्रासादकरसंख्यया । सान्धकारे पुनः कार्यो मध्यप्रासादमानतः ॥" प्रकाश वाले (विना परिक्रमा वाले) प्रासाद का ध्वजादंड प्रासाद के मान का बनावे, अर्थात् प्रासाद का जितना विस्तार हो उतना लंबा ध्वजाडड बनावे। अंधकार वाले (परिक्रमा वाले) प्रासाद का ध्वजादंड मध्य प्रासाद के मान का बनावे। अर्थात् परिक्रमा और उसकी दीवार को छोड़कर के गभारे के दोनो दीवार तक के मान का बनावे। ध्वजादंड का विस्तारमान— एकहस्ते तु प्रासादे दण्डः पादोनमङ्गुलम् । कुर्यादर्घाङ्गुला वृद्धि-र्यावत्पञ्चाशद्धस्तकम् ॥४३॥ २. 'पृथु' । *यह मत प्रचार मे अधिक है।
६२ प्रासादमण्डने एक हाथ के विस्तार वाले प्रासाद के ध्वजादंड का विस्तार पौन अंगुल का रक्खे । पीछे पचास हाथ तक के प्रासाद मे प्रत्येक हाथ आधा २ अंगुल बढ़ा करके रक्खें ॥४३॥ ध्वजादंड की रचना— सुवृत्तः सारदारुश्च ग्रन्थिकोटरवजिंतः । पर्वभिर्विषमैः कार्यः समग्रन्थिः सुखावहः ॥४४॥ ध्वजादंड बहुत अच्छा और किसी प्रकार की गांठ या पोलाण आदि दोषो से रहित, तथा मजबूत काष्ठ का सुन्दर एवं गोलाकार बनावें । दंड में पर्व (विभाग) विषम संख्या में और ग्रन्थी (चूड़ी) समसंख्या में रखना सुखदायक है ॥४४॥ विषमपर्व वाले ध्वजादंड के तेरह नाम— “जयन्तस्त्वेकपर्वश्च त्रिपर्वशत्रु मर्दनः । पिङ्गल; पञ्चपर्वश्च सप्तपर्वश्च सम्भवः ॥ श्रीमुखो नवपर्वश्च आनन्दो रुद्रपर्वकः । त्रिदेवो विश्वपर्वश्च तिथिभिर्दिव्यशेखरः ॥ मुनीन्दुभिः कालदण्डो महोत्कटो नवेन्दुतः । सूर्याख्यस्त्वेर्काविशत्या कमलो वह्निनेत्रतः ॥ तत्त्वपर्वो विश्वकर्मा दण्डनामानि पर्वतः । शस्ताशस्तत्वमेतेषामभिधानगुणोद्भवम् ॥” अप० सू० १४४ एक पर्व वाला जयंत, तीन पर्ववाला शत्रु मर्दन, पांच पर्व का पिंगल, सात पर्व का संभव, नव पर्व का श्रीमुख, ग्यारह पर्व का आनंद, तेरह पर्व का त्रिदेव, पंद्रह पर्व का दिव्यशेखर, सत्रह पर्व का कालदंड, उन्नीस पर्व का महाउत्कट, इक्कीस पर्व का सूर्य, तेबीस पर्व का कमल और पच्चीस पर्व का विश्वकर्मा कहलाता है । वे तेरह प्रकार के डंड के नाम पर्व के अनुसार है और नाम के अनुसार शुभाशुभ फल देने वाले है । ध्वजादण्ड की मर्कटी (पाटली)— दण्डदीर्घषडंशेन मर्कट्यर्धेन विस्तृता । अर्द्ध चन्द्राकृतिः पार्श्वे घटोर्ध्वं कलशस्तथा ॥४५॥ ध्वजादंड की लंबाई के छठे भाग की मर्कटी (पाटली) की लंबाई रक्खें । लंबाई से आधी विस्तार मे रक्खे । (विस्तार के तीसरे भाग की मोटाई रक्खे ।) पाटली का सम्मुख
चतुर्थोऽध्यायः ६३ भाग अर्द्धचन्द्र के आकार वाला बनावे। इसके कोने मे घंटडीया लगावे और ऊपर कलश रखे ॥४५॥ अपराजितपृच्छा सूत्र १४४ में कहा है कि— "मण्डूकी तस्य कर्त्तव्या अर्धचन्द्राकृतिस्तथा। पृथुदण्डसप्तगुणा हस्तादिपञ्चकावधि ॥ षड्गुणा च द्वादशान्तं शेषाः पञ्चगुणास्तथा । तथा त्रिभागविस्ताराः कर्त्तव्याः सर्वकामदाः ॥ अर्धचन्द्राकृतिश्चैव पक्षे कुर्याद् गगारकम् । वंशोर्ध्व कलशं चैव पक्षे घण्टाप्रलम्बनम् ॥" ध्वजादंड की पाटली अर्धचंद्र के आकार की बनावे । वह एक से पाच हाथ तक के लबे व जादंड के विस्तार से सातगुणी, छह से बारह हाथ तक के लम्बे ध्वजादंड के विस्तार से षगुणी और तेरह से पचास हाथ तक के ध्वजादंड के विस्तार से पाचगुणी पाटली लम्बाई मे रखे। लम्बाई का तीसरा भाग विस्तार मे रखे । यह सब इच्छितफल को देनेवाली है । अर्धचंद्राकृति के दोनो तरफ गगारक बनावे । दंड के ऊपर कलश रखे और पाटली के दोनो वगल में लम्बी घंटडीया लगाना चाहिये । ध्वजा का मान--- ध्वजा दण्डप्रमाणेन दैर्घ्येऽष्टांशेन विस्तरे । नानावस्त्रैर्विचित्रार्था-स्त्रिपञ्चाग्रशिखोत्तमा ॥४६॥ ध्वजादंड के लबाई के मान की ध्वजा की लंबाई रक्खे और लम्बाई से आठवे भाग की चौड़ाई रखे । यह अनेक वर्ण के वस्त्रो की बनावे और अग्रभाग मे तीन अथवा पाच शिखाये बनावे ॥४६॥ ध्वजा का महात्म्य— पुरे च नगरे कोट्टे रथे राजगृहे तथा । वापीकूपतडागेषु ध्वजाः कार्याः सुशोभनाः ॥४७॥ पुर, नगर, किला, रथ, राजमहल, वावडी, कूंआं और तालाव आदि स्थानो के ऊपर सुन्दर ध्वजा रखनी चाहिये ॥४७॥ निष्पन्नं शिखरं दृष्ट्वा ध्वजहीने सुरालये । असुरा वासमिच्छन्ति ध्वजहीनं न कारयेत् ॥४८॥
६४ प्रासादमण्डने तैयार हुए प्रासाद के शिखर को ध्वजा रहित देखकर असुर (राक्षस) उसमे रहने की इच्छा करते है । इसलिये देवालय ध्वजा रहित नहीं रखना चाहिये ॥४८॥ ध्वजोच्छ्रायेण तुष्यन्ति देवाश्च पितरस्तथा । दशाश्वमेधिकं पुण्यं सर्वतीर्थधरादिकम् ॥४६॥ देवालय के ऊपर ध्वजा चढ़ाने से देव और पितर संतुष्ट होते है । तथा दशाश्वमेध यज्ञ करने से और समस्त भूतल की तीर्थयात्रा करने से जो पुण्य होता है, वही पुण्य प्रासाद के ऊपर ध्वजा चढ़ाने से होता है ॥४६॥ पञ्चाशत् पूर्वतः पश्चाद्-आत्मानं च तथाधिकम् । शतमेकोत्तरं सोऽपि तारयेन्नरकार्णवात् ॥५०॥ इति ध्वजलक्षणं पुण्याधिकारः । इति श्री सूत्रधारमण्डनविरचिते प्रासादमण्डने वास्तुशास्त्रे प्रतिमा- प्रमाणदृष्टिपदस्थानशिखरध्वजाकलशलक्षणाधिकारश्चतुर्थोऽध्यायः ॥४॥ ध्वजा चढ़ानेवाले के वंश की पहले की पचास और पीछे की पचास, तथा एक अपनी इस तरह कुल एकसौ एक पीढ़ी के पूर्वजों को नरकरूपी समुद्र से यह ध्वजा तिरा देती है अर्थात् उद्धार करती है ॥५०॥ इति श्री पंडित भगवानदास जैन विरचित प्रासादमण्डन ग्रन्थ के चौथा- अध्ययन की सुबोधिनी नाम्नी भाषाटीका समाप्ता ॥४॥
अथ प्रासादमण्डने पञ्चमोऽध्यायः मंगल— नानाविधमिदं विश्वं विचित्रं येन सूत्रितम् । सूत्रधारः श्रेयसेऽस्तु¹ सर्वेषां पालनक्षमः ॥१॥ जिसने अनेक प्रकार का यह विचित्र जगत बनाया है, यही सूत्रधार (विश्वकर्मा) सबका पालन करने मे समर्थ है। और यही सबके कल्याण के लिये हों ॥१॥ ग्रंथ मान्यता की याचना— न्यूनाधिकं प्रसिद्धं च यत् किञ्चिन्मण्डनोदितम् । विश्वकर्मप्रसादेन शिल्पिभिर्मान्यतां वचः ॥२॥ जगत में जो कुछ मंडन सूत्रधार का न्यूनाधिक रूप से कहा हुआ शिल्पशास्त्र प्रसिद्ध है, वह विश्वकर्मा की कृपा से शिल्पियो से मान्य हो ॥२॥ वैराज्यपासाद— चतुर्भागं समारभ्य यावत्सूर्योत्तरं शतम् । भागसंख्येति विख्याता फालना कर्णबाह्यतः ॥३॥ चार भाग से लेकर एकसो बारह भाग तक के वैराज्यादि प्रासाद होते है । तथा उनकी फालनाऐ कोने से बाहर निकलती होती है । ॥३॥ फालना के भेद— अष्टोत्तरशतं भेदा अंशवृद्ध्या भवन्ति ते । समांशैर्विषमैः कार्या-नन्तभेदैश्च फालना ॥४॥ एक २ अंशकी वृद्धि से फालना का एक सौ आठ भेद होते हैं। एवं समांश और विषमांश के भेदो से फालना के अनन्त भेद भी होते है ॥४॥ एकस्यापि तलस्योध्र्वे शिखराणि बहून्यपि । नामानि जातयस्तेषा-मूर्ध्वमार्गानुसारतः ॥५॥ एक ही तल के ऊपर बहुत प्रकार के शिखर बनाये जाते है और उन शिखरो के निर्माण १. 'स एव स्यात्' ।
६६ | प्रासादमण्डने
से ही प्रासादों के नाम और उसकी जाति, ये दोनों उत्पन्न होते है ॥५॥ भ्रमणी (परिक्रमा)— दशहस्तादधो न स्यात् प्रासादो भ्रमसंयुतः । नवाष्टदशभागेन भ्रमो भित्तिर्विधीयते ॥६॥ दस हाथ से न्यून प्रासाद को भ्रमणी (परिक्रमा) नहीं किया जाता, किन्तु दस हाथ से अधिक विस्तार वाले प्रासाद को भ्रमणी करना चाहिये। भ्रमणी और दीवार प्रासाद के आठ नव अथवा दसवें भाग की रखना चाहिये ॥६॥ १-वैराज्य प्रासाद— वैराज्यश्चतुरस्रः स्याच्चतुद्वारे चतुष्किका । प्रासादो ब्रह्मणः प्रोक्तो निर्मितो विश्वकर्मणा ॥७॥ प्रथम वैराज्य प्रासाद समचोरस और चार द्वार वाला है। प्रत्येक द्वार चौकी मंडप वाला बनावे। यह प्रासाद ब्रह्माजी ने कहा है और विश्वकर्मा ने निर्माण किया है ॥७॥ अपराजितपृच्छा सूत्र १५५ में कहा है कि— “चतुरस्रीकृते क्षेत्रे तथा षोडशभाजिते । तस्य मध्यं चतुर्भागै-गर्भं सूत्रैश्च कारयेत् ॥ द्वादशस्वथ शेषेषु बाह्ये भित्तीः प्रकल्पयेत् ॥” वैराज्य प्रासाद की समचोरस भूमिका सोलह भाग कर के उन में से चार भाग का मध्य गर्भगृह बनावे और बाकी बारह भाग में दो २ भाग की दीवार और दो भागकी भ्रमणी बनावे । सपादं शिखरं कार्यं घण्टाकलशभूषितम् । चतुर्भिः शुकनासैस्तु सिंहकर्णैर्विराजितम् ॥८॥ इसके शिखर का उदय विस्तार से सवाया बनावे । तथा आमलसार और कलश से सोभायमान करें। एवं चारों ही दिशा मे शुकनाश तथा सिंहकर्ण आदि से शिखर को शोभायमान बनावे ॥८॥
रेखाचित्र विवरण (चित्रगत पाठ):
- शिखर के पार्श्व में (उर्ध्व पाठ): वैराज्यादि प्रकृति प्रथम विभक्ति अंक ॥१॥
- तलच्छन्द (Ground Plan) में अंकित पाठ: गर्भगृह, भित्ति, भ्रम, २, भित्ति
ओरीसा जगन्नाथपुरी का वैराज्यादि जाति का एकाण्डक शिखर