भारतकोश
प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

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पृष्ठ 12

११ आठवा अध्याय साधारण नामका है। उसमे वास्तुदोष, दिङ्मूढ दोष, जीर्णवास्तु, महादोष, भिन्नदोष, अगहीनदोष, आश्रम, मठ, प्रतिष्ठाविधि, प्रतिष्ठा मडप, यज्ञकुण्ड, मडलप्रतिष्ठा, प्रासाद देवन्यास, जिनदेवप्रतिष्ठा, जलाशयप्रतिष्ठा, वास्तुपुरुष का स्वरूप और ग्रथसमाप्ति मगल आदिका वर्णन है। परिशिष्ट न० १ मे केसरी आदि पचीस प्रासादो का सविस्तर वर्णन है। उनकी विभक्तियो की प्रासाद संख्या मे शास्त्रीय मतातर है। जैसे—'समरागण सूत्रधार' मे अठारहवी विभक्ति का एक भी प्रासाद नही है। एवं शिल्पशास्त्री नर्मदाशकर सम्पादित शिल्परत्नाकर' मे बीसवी विभक्ति का एक भी प्रासाद नही है। शिल्परत्नाकर मे केसरी जातिका दूसरा सर्वतोभद्र प्रासाद नवशृ गो वाला है, उसके चार कोने पर और चार भद्र के ऊपर एक एक शृ ग चढाया है, यह शास्त्रीय नही है, क्योकि सपादक ने इसमे मन कल्पित परिवर्तन कर दिया है। शास्त्र मे तो नवशृ ग कोने के ऊपर चढाने का और भद्र के ऊपर शृ ग नही चढाने का लिखा है। क्षीरार्णव ग्रथ मे साफ लिखा है कि—'कर्णे शृङ्गद्वय कार्यं भद्रे शृ ग विवर्जयेत्।' इस प्रकार सोमपुरा अबाराम विश्वनाथ प्रकाशित 'केसरादि प्रासादमडन' के पृष्ठ २५ श्लोक १० मे भी लिखा है। मगर शिल्परत्नाकर के सम्पादक ने इस श्लोक का परिवर्तन करके 'कर्णे शृंग तथा कार्यं भद्रे शृ ग तथैव च'। ऐसा लिखा है। इस प्रकार प्राचीन वास्तुशिल्पका परिवर्त्तन करना विद्वानोको के लिये अनुचित माना जाता है। इसका परिणाम यह हुआ कि—दीपार्णव के सम्पादक ने भी सर्वतोभद्र प्रासाद के शृ गो का क्रम रक्खा, देखिये पृष्ठ न० ३२१ मे सर्वतोभद्र प्रासाद के शिखर का रेखाचित्र । परिशिष्ट न० २ मे जिनप्रासादो का सविस्तृत वर्णन है। इन प्रासादो के ऊपर श्रीवत्स शृ गो के बदले केसरी आदि शृंगो का क्रम चढाने का लिखा है। क्रम शब्द यहा शृ गो का समुहवाचक माना जाता है। पहला क्रम पाच शृ गो का दूसरा क्रम नव शृ गो का, तीसरा क्रम तेरह शृ गोका, चौथा क्रम सत्रह शृ गो का और पाचवा क्रम इक्कीस शृ गो का समुह है। अर्थात् केसरी आदि प्रासादो की शृ ग सख्या को क्रम की सज्ञा दी है। शास्त्रकार जितना न्यूनाधिक क्रम चढाने का लिखते है, वहा आधुनिक शिल्पी नीचे की पंक्ति मे एकही सख्या के क्रम चढाते है। जैसे कि—किसी प्रासाद के कोनेके ऊपर चार क्रम, प्रतिकर्ण के ऊपर तीन क्रम, उपरय के ऊपर दो क्रम चढाने का लिखा है। वहा आधुनिक शिल्पी नीचे की प्रथम पंक्ति मे सबके ऊपर चौथा क्रम चढाते हैं। उसके ऊपर की पंक्ति मे सबके ऊपर तीसरा क्रम चढाते है। यह नियम अशास्त्रीय है। इस प्रकार प्राचीन देवालयो मे चढाये हुए नही हैं। शास्त्रीय नियम ऐसा है कि—जिस अग के ऊपर जितना क्रम चढाने का लिखा है, वहा सब जगह प्रथम क्रम से ही गिन करके चढावे। अर्थात् कोने के ऊपर चार क्रम चढाने का है वहा नीचे की प्रथम पंक्ति मे चौथा, उसके ऊपर तीसरा, उसके ऊपर दूसरा और उसके ऊपर पहला क्रम चढाया जाता है। प्रतिकर्ण के ऊपर तीन क्रम चढाने का लिखा है, वहा नीचे की प्रथम पंक्ति मे तीसरा, उसके ऊपर दूसरा और उसके ऊपर प्रथम, उपरय के ऊपर दो क्रम चढाने का लिखा हो वहा पहला क्रम दूसरा, उसके ऊपर पहला क्रम चढाना चाहिये। देखिये अपराजित पृच्छामूत्र के पुष्पकादि प्रासादो की जाति। ऐसा शास्त्रीय नियम के अनुसार नही करने मे शिल्परत्नाकर के षष्टम रत्न मे जिनप्रासादो का स्वरूप लिखा है— उसमे शृ गो की क्रम सख्या वरावर नही मिलती है, उसकी कोपी द्रु