प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१० रखा होगा, मगर 'दोनो प्रकार के ध्वजदंड भवने के लिये शुभ है।' ऐसा अर्थ श्लोक से निकलता नही है, परन्तु शक्तिदेवी के मंदिरो मे ही दोनो प्रकार के ध्वजदंड बनाना ऐसा निकलता है। अन्य मंदिरो के लिये तो विषमपर्व और समग्रंथी वाला ही ध्वजदंड रखना शास्त्रीय है। पाचवे अध्ययन मे प्रासादो मे मुख्य जाति वैराज्य आदि पचीस प्रासादो का सविस्तर वर्णन उनकी विभक्ति के नक्शे के साथ लिखा गया है। छठ्ठे अध्ययन मे केसरी जाति के पचीस प्रासादो के नाम और उनकी तल विभक्ति के मतमतान्तर लिखा है। और नव महामेरु प्रासादो का वर्णन है। केसरी आदि पचीस प्रासादो का सविस्तर वर्णन ग्रंथकार ने लिखा नही है, जिसे इस ग्रंथ के अत में परिशिष्ट नं० १ मे अपराजित पृच्छासूत्र० १५६ का केसरी आदि प्रासादों का सविस्तर वर्णन अनेक नक्शे आदि देकर लिखा हुआ है। सातवे अध्ययन मे प्रासाद के मंडपो का सविस्तर वर्णन रेखा चित्र देकर लिखा गया है। उसमे पेज न० ११६ श्लो० ७ मे 'शुकनाससमा घण्टा न्यूना श्रेष्ठा न चाधिका।' का अर्थ दीपार्णव के सम्पादक पेज नं० १३३ मे नीचे टिप्पणी मे 'शुकनासयी घंटा ऊंची न करवी, पण नीची होय तो दोप नयी।' ऐसा लिखा है और उसकी पुष्टता के लिये अपराजित पृच्छानूत्र १५५ श्लोक १३ वा का उत्तरार्द्ध भी लिखा है। यह वास्तविक नही है, क्योकि जो उत्तरार्द्ध लिखा है वह घंटा नीची रखने के संबंध का नही है, परन्तु शुकनास के रखने के स्थान का विषय है। छज्जा से लेकर शिखर के स्कंध तक की ऊंचाई का इक्कीस भाग करना, उनमे से तेरह भाग की ऊंचाई मे शुकनास रखना। तेरहवे भाग से अधिक ऊंचा नही रखना, किन्तु तेरहवा भाग से नीचा रखना दोष नही है। ऐसा अर्थ है उसको आमलसार घंटा का संबंध मिलाना अप्रामाणिक माना जाता है। वितान ( चंदवा )— छत के नीचे के तल भाग को वितान-चादनी अथवा चदवा कहते है। उसके मुख्य तीन भेद हैं— १. छत मे जो लटकती आकृति होवे, वह 'क्षिप्तवितान' कहा जाता है। २ छत की आकृति ऊंची गोल गुम्बज के जैसी हो वह 'उत्क्षिप्त वितान' कहा जाता है। ३ यदि छत समतल हो तो उसको 'समतल वितान' कहते हैं। यह बिलकुल सादी अथवा अनेक प्रकार के चित्रो मे चितरी हुई अथवा खुदाई वाली होती है। दीपार्णव के पृष्ठ १३८ मे श्लोक २२ के अनुवाद मे क्षितोत्क्षिप्त, समतल और उदित, ये तीन प्रकार के वितान लिखे हैं। यहा उदित शब्द वद्घातुका भूत कृदत है, इसलिये इसका अर्थ 'कहा है' ऐसा क्रिया- वाचक होना चाहिये। संवरणा— संवरणा को शिल्पीवर्ग साभरण कहते हैं यह मंडप की छत के ऊपर अनेक कलशो की आकृति वाला होता है। इसकी रचना शास्त्रीय पद्धति का विस्मरण होजाने मे अपनी बुद्धि अनुसार शिल्पीओ बनाते हैं।