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प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

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पृष्ठ 10

६ देवो के पदस्थान सवध मे शास्त्रीय अनेक मत मतान्तर है । इन हरएक का साराश यह है कि 'दीवार से दूर रखकर मूर्त्ति को स्थापित करना चाहिये' । दीवार से चीपका करके किसी भी देव की मूर्त्ति स्थापित नही करना चाहिये । इस विषय मे यह ग्रंथकार मतमतान्तर को छोड करके गर्भगृह के ऊपर के पाट के आगे के भाग मे देवो को स्थापित करना लिखते है, यह वास्तविक है । रेखा— शिखर की ऊंचाई की गोलाई का निश्चय करने के लिये शिखर के नीचे के पायचे से ऊपर के स्कध तक जो लकीरे खीची जाती है, उसको रेखा कहते हैं । रेखाओ से शिखर निर्दोष बनता है । ऐसा शिल्पीवर्ग मे मान्यता है । मगर इस रेखा संवधी रहस्यमय ज्ञान लुप्त प्राय. हो गया है । जिसे इसका रहस्य मुझे मालूम नही हो सका, जोकि अनुवाद मे पृष्ठ न० ७७ मे एक रेखा चित्र दिया है, जिससे शिल्पिगण इस पर विचार करके रेखा की वास्तविकता का निर्णय करेंगे तो वास्तु शास्त्र के इस विषय का प्रचार हो सकेगा । ध्वजादंड— वास्तु शिल्पशास्त्र का विशेष अध्ययन न होने से शिल्पिगण ध्वजादड रखने का स्थान विस्मृत होगये है, जिमे ये देवालय का निर्माण करते समय ध्वजादड को आमलसार मे स्थापन करते हैं, यह प्रामाणिक नही है । शास्त्र मे शिखर की ऊचाई का छह भाग करके ऊपर के छठ्ठे भाग का फिर चार भाग करके नीचे का एक भाग छोड देना, उसके ऊपर का तीसरे भाग मे ध्वजादड रखने का कलावा बनाना लिखा है । देखो पेज न० ८६,६० । एव ध्वजादड को मजबूत रखने के लिये उसके साथ एक दडिका भी वज्रबध करके रखी जाती है । यह प्रथा तो प्राय बिलकुल लुप्त होगई है । शास्त्र मे ध्वजाधार का स्थान लिखा है, परन्तु शिल्पी ध्वजाधार का अर्थ ध्वजा को धारण करने वाला 'ध्वजपुरुष' ऐसा करते है, जिसे ध्वजादड रखने के स्थान पर ध्वजपुरुष की आकृति रखते है । और शिल्परत्नाकर पेज न० १८४ श्लोक ५४ का गुजराती अनुवाद मे 'ध्वजाधर अर्थात् ध्वजपुरुष करवो' लिखा है, उसका प्रमाण देते है । उन शिल्पियो को समझना चाहिये कि ध्वजाधार का अर्थ ध्वजपुरुष नही, लेकिन ध्वजादड रखने का कलावा है । दीपार्णव ग्रथ मे नवीन बने हुए देवालयो के चित्र दिये गये हैं, उनके शिखरो के आमलसारो मे ध्वजादंड रखा हुआ मालूम होता है, उनको देखकर अपने ये प्रामाणिक मान लेवें तो दीपार्णव के पेज ११५ मे श्लोक ४६, ५० का अनुवाद पेज न० ११६ मे लिखा है कि—"जो स्कधना मूलमा ध्वजदड प्रविष्ट थाय तो स्कंधवेध जाणवो, स्कंधवेधथी स्वामी अने शिल्पीनो नाश थाय छे ।'' यह शास्त्रीय कथन झूठा हो जाता है । शास्त्रीय कथन सत्य मानने के लिये प्रासादमडन के पेज न० ६० मे दिये गये ध्वजदड के रेखा चित्र देखें, इस प्रकार ध्वजदड रखना प्रामाणिक है । दीपार्णव के पृष्ठ न० १२६ की टिप्पणी मे क्षीरार्णव का एक श्लोक का प्रमाण देकर लिखा है कि—'समपर्व अने एकी कागरणी वाला ध्वजादड शक्तिदेवी ना (अने महादेवना) मदिरोमा कराववो । जो के एकी के बेकी वेउ प्रकारना ध्वजादडो भवनने विषे तो शुभ ज छे ।' इस विषय मे शिल्पियो को विचार करना चाहिये । यह श्लोक क्षीरार्णव मे नही है, किसी अन्य ग्रथ का होगा या अनुवादक ने मन कल्पित बनाकर