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प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

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उदुम्बर (देहली)— देवालय के द्वार की देहली और स्तंभ की कुम्भीओ की ऊंचाई मंडोवर के कुम्भा थर की ऊंचाई के बराबर करना लिखा है। परन्तु कभी बड़े प्रासादो में कुम्भा की ऊंचाई अधिक होती है, तो देहली की ऊंचाई भी अधिक होती है। ऐसे समय मे देहली को नीचा उतारना शास्त्र मे लिखा है। इस विषय मे शिल्पियो में मतभेद चल रहा है। कोई शिल्पी कहते हैं कि—'देहली नीची की जाय तो उसके साथ स्तंभ की कुम्भियां भी देहली के बराबर नीची की जाय' और कोई शिल्पी देहली नीची करते हैं, परन्तु स्तंभ की कुम्भिया नीची नही करते। इस मतभेद मे जो शिल्पी देहली के साथ कुम्भियां भी नीची करता है, उसका मत शास्त्र की दृष्टि से प्रामाणिक मालूम नही होता है। कारण अपराजित पृच्छा सूत्र १२६ श्लोक ६ मे तो कुम्भीओ से देहली नीची उतारना लिखते हैं, तो कुम्भीओ नीचे कैसे उतरे ? वैसे क्षीरार्णव मे तो स्पष्ट लिखा है कि—"उदुम्बरे हृते (क्षते) कुम्भी स्तम्भं तु पूर्ववत् भवेत् ।" कभी देहली नीची किया जाय तो भी स्तंभ और उनकी कुम्भिया पहले के शास्त्रीय नाप के बराबर रखना चाहिये। इससे स्पष्ट मालूम होता है कि—जो शिल्पि देहली के साथ कुम्भीओ नीची करना मानते हैं—यह प्रामाणिक नहीं है। द्वार शाखा— द्वार की शाखा के विषय मे भी शिल्पियो में मतभेद मालूम होता है। स्तंभ शाखा के दोनो तरफ एक एक कोशी बनाई जाती है, उनको शिल्परत्नाकर के सम्पादक शाखा मानते नही हैं और दीपार्णव के सम्पादक शाखा मानते हैं। देखो दीपार्णव पेज नं० ८१ मे द्वारशाखा का रेखा चित्र है। उसमे स्तंभ के दोनो तरफ की कोशियो को शाख मान करके त्रिशाखा द्वार को पंच शाखा द्वार लिखा है, एवं पेज नं० ३६८ और ३६९ के बीच में द्वारशाखा का ब्लॉक छपा है, यह चित्र शिल्परत्नाकर का होने से बीच मे त्रिशाखा द्वार छपा है और नीचे उसके खंडन रूप से पंच शाखा द्वार लिखा है। इसीसे स्पष्ट मालूम होता है कि स्तंभ शाखा की कोशिओ को दीपार्णव के सम्पादक शाखा मानते हैं, जिसे उसके मत से नवशाखा वाला द्वार मे दो स्तंभ शाखा होने से तेरह शाखा वाला द्वार माना जाय तो यह अशास्त्रीय हो जाता है। क्योकि ग्रन्थकार स्तंभ शाखा के दोनो तरफ कोशिया बनाना लिखते हैं, परन्तु उसको शाखा नहीं मानते। इसलिये स्तंभ की दोनो तरफ की कोशियो को शाखा मानने वाले शिल्पियो का मत अशास्त्रीय होने से प्रामाणिक नही माना जाय। • चतुर्थ अध्ययन में मूर्ति और सिंहासन का नाप, गर्भगृह का नाप, देवों की दृष्टि, देवो का पद स्थान, उच्छ्रंगो का क्रम, रेखा विचार, शिखर विधान, आमलसार, कलश, शुकनास, कोली मंडप का विधान, सुवर्णपुरुष की रचना, ध्वजादंड का माप और उसका स्थान आदिका वर्णन है। देवदृष्टि स्थान— देवो की दृष्टि द्वार के किस विभाग में रखा जाय, इस विषय मे शिल्पियो में मतभेद है। कितनेक शिल्पी शास्त्र मे कहे हुए एक भाग मे दृष्टि नही रखते, परन्तु कहा हुआ भाग और उसके ऊपर का भाग, इन दोनो भाग की संधी मे आंख की कीकी रखते हैं, जिसे उनके हिसाब से एक भाग मे दृष्टि रखने का संबंध नही मिलता। इसलिये शास्त्र के हिसाब मे दृष्टि स्थान न होने से उसका मत प्रामाणिक नही माना जाता ।