प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७ कितनैक आधुनिक शिल्पी जगती पीठ का वास्तविक स्वरूप को जानते है, ऐसा प्रतीत नही होता, क्योकि आजकल जो नवीन प्रासाद अथवा महाप्रासाद बनते हैं, उनमे जगती पीठ का अभाव ही मालूम होता है। ऐसा निराश्रय प्रासाद को शास्त्रकार उदयकारक नही मानते है। शिव स्नानजल-- शिवजी के स्नान का जल दृष्टिगोचर होने से एव उसका उल्लघन करने से दोष लगता है, ऐसा सनातन धर्माम्नाय है। जिसे शिवलिंग की पीठिका की नाली के नीचे चंडनाथ गण की स्थापना की जाती है। तब स्नानजल चड गण के मुखमे जाकर वापस गिरता है, उसको उच्छिष्ट (जूठा) मान लिया जाता है। ऐसा शिवस्नान जल का लाघन होजाय तो दोष नही माना जाता। चडनाथ गण की स्थापना की प्रथा मुझे किसी शिवालय मे देखने नही मिली यह वास्तु शास्त्र का प्रचार न होना समझना चाहिये । नाभिवेध-- एक देव के सामने दूसरे देव स्थापित किया जाय अथवा एक देवालय के सामने दूसरा देवालय बनवाया जाय तो उसको शास्त्रकार 'नाभिवेध' होना मानते हैं, यह अशुभ है, परतु स्वजातीय देव आपस मे सम्मुख हो तो नाभिवेध का दोष नही माना जाता । नाभिवेध के निषेध का कारण यह हो सकता है कि—एक देव का दर्शन करते हुए दर्शक की पीठ दूसरे देव के सामने रहती है। दूसरा कारण यह भी है कि—देव की दृष्टि का अवरोध होना दोषत माना है। तीसरे अध्याय मे खरशिला, भिट्ट, पीठ, मडोवर (दीवार), देहली, द्वारमान, तथा त्रि, पच, सप्त और नवशाला आदिका वर्णन है। आधुनिक कितनैक शिल्पी देवालय की पीठ छोटी रखते है, जिसे देवालय दबा हुआ मालूम होता है और पीठ मान से न्यून होने से वाहन का विनाश होना शास्त्रकार लिखते हैं, पीठ न्यून रखने के विषय मे दीपार्णव ग्रंथ की सम्पादकीय टिप्पणी पेज न० ५३ मे 'शास्त्रीयमान जो आया हो उसमे से भी फिर अर्द्ध भाग के मान का पीठ बनाना लिखा है।' यह तद्दन अशास्त्रीय मन कल्पित है। मेरुमंडोवर-- प्रासाद की दीवार मे दो जघा के ऊपर एक छज्जा होवे, उसको 'मेरुमंडोवर' कहा जाता है। क्षीरार्णव ग्रंथकार लिखते है कि—मेरुमडोवर को बारह जघा और छह छज्जा बनाया जाता है, इस हिसाब से दो दो जघा के ऊपर एक एक छज्जा रखा जाता है।' प्रस्तुत ग्रंथ मे प्रथम माल मे दो जघा और एक छज्जा, तथा दूसरे माल मे एक जघा और एक छज्जा बनाना लिखा है। इसी प्रकार आबू के और राणकपुर के जिनालयो मे देखा जाता है। जयपुर प्रान्तीय आमेर मे जगत् शिरोमणि के मदिर मे प्रत्येक जघा के ऊपर छज्जा रक्खा गया है। दीपार्णव मे प्राचीन देवालयो के तीन चार फोटू मे पीठ और छज्जा रहित लिखा है, यह नजर चूक से लिखा मालूम होता है। पीठ तो सबको हैं, और छज्जा का निर्गम नही होने से छज्जा हीन मालूम होता है।