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प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

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६ इंच, फुट और गज आदिका नाप ब्रीतीश साम्राज्य से हुआ है । इसलिये - इसका - प्रचार अभी तक चला आ रहा है । आधुनिक शिल्पी अंगुल को एक इंच और हाथ को दो फुट मानकर के कार्य करते है । ग्रंथकार— प्रासाद का निर्माण करने के लिये यह प्रासाद मंडन नाम का ग्रंथ प्रखर विद्वान् 'मंडन' नाम के सूत्रधार ने मेवाड़ के महाराणा कुम्भकर्ण के समय रचा है । इस विषय मे विस्तारपूर्वक वर्णन सुप्रसिद्ध विद्वद्रत्न डॉ० वासुदेव शरणजी अग्रवाल अध्यक्ष—कला और वास्तुविभाग, काशी विश्वविद्यालय की लिखी हुई विस्तृत भूमिका है, इसमे विस्तार पूर्वक लिखा गया है । ग्रंथविषय— इस ग्रंथ मे आठ अध्याय है । प्रथमाध्याय मे प्रासाद की १४ जाति, भूमि परीक्षा, खातमुहूर्त्त, वत्सचक्र, आय, व्यय, नक्षत्र आदिका गणित, दिक्साधन, खातविधि कूर्ममान, धारिणी आदि शिला का नाप और देवालय बाधने का फल इत्यादि विषयो का वर्णन है । दिक्साधन— वास्तु शिल्पग्रंथो मे ध्रुव को उत्तर दिशा मान करके दिक्साधन करने का विधान है, परन्तु आधुनिक वैज्ञानिक दिक्साधन यत्र जिसको कुतुबनुमा कहते हैं, इससे देखने से मालूम होता है कि ध्रुव ठीक उत्तर दिशा मे नही है, पश्चिम दिशा तरफ लगभग बीस डीग्री हटा हुआ मालूम होता है । जिसे ध्रुव को उत्तर दिशा मान करके दिशा का साधन किया जाय तो वास्तविक दिशा का ज्ञान नही होगा । दिन मे दिक्साधन बारह अंगुल के माप वाला शकु से करने का विधान है। परन्तु सूर्य प्रतिदिन एक ही बिन्दु के ऊपर उदय नही होता है । जिसे शकु की छाया मे विषमता होती है । इसलिये इसमे भी अमुक अंशो के सस्कार की आवश्यकता रहती है । एवं श्रवण, कृत्तिका, चित्रा और स्वाति नक्षत्र भी बराबर पूर्व दिशा मे उदय नही होते हैं, जिसे इससे भी वास्तविक दिशा का ज्ञान नही होता । इस दिक्साधन के बावत विचार किया जाय तो आधुनिक वैज्ञानिक दिक्साधन यंत्र द्वारा ही करना अधिक अच्छा रहेगा । शास्त्रो मे लिखे हुए प्रमाण उस समय बराबर होगे, परन्तु सेकडो वर्ष व्यतीत होनेसे नक्षत्र और ताराओ की स्थिति मे परिवर्त्तन होजाते हैं । खात मुहूर्त्त के बावत मे शेषनाग चक्र देखा जाता है , उसमे भी अधिक मतमतातर है । कोई शास्त्र शेषनाग की स्थिति सृष्टि क्रम से मानते हैं तो कोई शास्त्र विलोम क्रम से मानते है । इसमे भी ज्योतिष शास्त्र और वास्तुशास्त्र मे बहुत मतान्तर है । इसका विशेष खुलासा मेरा अनुवादित राजवल्लभ मंडन ग्रंथ मे लिखा है । दूसरे अध्याय मे जगती ( प्रासाद बनाने की मर्यादित भूमि ) का वर्णन है । तथा देवो के वाहन का स्थान और उनका उदय, जिन प्रासाद के मंडप का क्रम, देव के सामने अन्य देव स्थापित करने का विषय, दिशा के देव, शिवस्नानोदक का विचार, प्रदक्षिणा, परनाल और देवो के आयतनो का वर्णन है ।