भारतकोश
प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

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१०२ प्रासादमण्डने मस्तके तस्य छाद्यस्य शृङ्गयुग्मं प्रदापयेत् । सितशृङ्गस्तदा नाम ईश्वरस्य सदा प्रियः ॥२४॥ रत्नशीर्ष प्रासाद के भद्र के तीन उरुशृंगों मे से एक कम करके उस स्थान पर मत्तालम्ब ( गवाक्ष ) बनावें और उसके छाद्य के ऊपर दो शृंग चढ़ावें । ऐसा सितशृंग नाम का प्रसाद ईश्वर को हमेशा प्रिय है ॥२४॥ शृंग संख्या—कोणे १२, प्ररथे १६, उपरथे ८ भद्रे १६ एक शिखर, कुल ५३ १३-भूधर और १४-भुवनमंडन प्रासाद— तिलकं यद्युपरथे भूधरो नाम नामतः । छाद्यशृङ्गे तु तिलकं नाम्ना भुवनमण्डनः ॥२५॥ सितशृंग प्रासाद के उपरथ ऊपर एक २ तिलक चढ़ावे, तो भूधर नाम का प्रासाद होता है और छाद्य के दोनों शृङ्गों के ऊपर एक २ तिलक चढ़ावे तो भुवनमंडन नाम का प्रासाद होता है ॥२५॥ १५-त्रैलोक्यविजय और १६-क्षितिवल्लभ प्रासाद-- शृङ्गद्वयं चोपरथे तिलकं कारयेत् सुधीः । त्रैलोक्यविजयो भद्रं शृङ्गेण क्षितिवल्लभः ॥२६॥ इति सप्ताङ्गाः सप्तप्रासादाः । यदि उपरथ के ऊपर दो शृंग और एक तिलक किया जाय तो त्रैलोक्यविजय नामका प्रासाद होता है और भद्र के ऊपर एक शृंग अधिक चढ़ाया जाय तो क्षितिवल्लभ नाम का प्रासाद होता है ॥२६॥ शृंगसंख्या—कोणे १२, प्ररथे १६ उपरथे १६- भद्रे १२ एक शिखर कुल ५७, तिलक ८ १७-महीधर प्रासाद-- दशभागकृते क्षेत्रे भद्रार्धं भागमानतः । त्रयः प्रतिरथाः कर्णो भागभागाः समो भवेत् ॥२७॥ कर्णे प्रतिरथे भद्रे द्वे द्वे शृङ्गे प्रकारयेत् । रथोपरथे तिलकं ग्रन्यङ्गं च रथोपरि ॥२८॥ मत्तालम्बयुतं भद्रं प्रासादोऽयं महीधरः ।