प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमोऽध्यायः १०३ समचोरस प्रासाद के तलका दस भाग करे । उनमें भद्रार्ध, कर्ण प्रतिकर्ण, रथ और उपरथ ये प्रत्येक एक २ भाग का बनावें और इनका निर्गम भी एक २ भाग का रखें । भद्र का निर्गम आधे भाग का रखें । कोना, प्रतिरथ और भद्र के ऊपर दो २ शृंग तथा रथ और उपरथ के ऊपर एक २ तिलक चढावें । एवं रथ के ऊपर प्रत्यंग चढावे । भद्र मत्तालंब ( गवाक्ष ) वाला बनावें । ऐसा महीधर नाम का प्रासाद है ॥२७-२८॥ शृंगसंख्या—कोणे ८, प्ररथे १६, भद्रे ८, प्रत्यग ८, एक शिखर कुल ४१ । तिलक- रथे ८, उपरथे ८ १८-कैलास प्रासादः— भद्रे शृङ्गं तृतीयं च कैलासः १ शङ्करप्रियः ॥२६॥ महीधर प्रासाद के भद्र के ऊपर तीसरा एक शृंग अधिक चढावे तो कैलाश नाम का प्रासाद होता है। यह शंकर को प्रिय है ॥२६॥ शृंगसंख्या-कोणे ८, प्ररथे १६, भद्रे १२, प्रत्यंग ८ एक शिखर कुल ४५ । तिलक-रथे ८ उपरथे ८ १६-नव मंगल और २०-गंधमादन प्रासाद— भद्रे त्यक्त्वा रथे शृङ्गं नवमङ्गल उच्यते । तथा भद्रे पुनर्द्दद्यात् तदासौ गन्धमादनः ॥३०॥ कैलाश प्रासाद के भद्र के ऊपर से एक ऊरुशृंग कम करके रथ के ऊपर एक २ शृंग चढ़ावे तो नवमंगल नामका प्रासाद होता है। यह नवमंगल प्रासाद के भद्र के ऊपर एक ऊरुशृंग अधिक चढावे तो गंधमादन नाम का प्रासाद होता है ॥३०॥ शृंगसंख्या-४१ । कोणे ८, प्ररथे १६, भद्रे ८, रथे ८, प्रत्यंग ८, एक शिखर । तिलक ८ उपरथे २१- सर्वाङ्गसुन्दर और २२- विजयानन्द प्रासाद— भद्रे त्यक्त्वा चोपरथे शृङ्गं सर्वाङ्गसुन्दरः । भद्रे दद्यात् पुनः शृङ्गं विजयानन्द उच्यते ॥३१॥ १. 'नाम नामतः' ।