प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०४ प्रासादमण्डने गंधमादन प्रासाद के भद्र के ऊपर से एक उरःशृंग कम करके उपरथ के ऊपर एक २ शृंग चढ़ावें, तो सर्वांगसुन्दर नाम का प्रासाद होता है। इसके भद्रके ऊपर एक २ उरःशृंग फिर चढ़ावे तो विजयानन्द नामका प्रासाद होता है ॥३१॥ शृंगसंख्या-कोणे ८, प्ररथे १६, रथे ८, भद्रे ८ उपरथे ८, प्रत्यंग ८, एक शिखर कुल ५७ २३-सर्वांगतिलक प्रासाद- मत्तालंवयुतं भद्र-मुरुशृङ्गं परित्यजेत् । शृङ्गद्वयं च छाद्योर्ध्वे सर्वांगतिलकस्तथा ॥३२॥ विजयानंद प्रासाद के भद्र के ऊपर से एक २ उरुशृंग कम कर के मत्तालंब (गवाक्ष) बनावें और इस गवाक्ष के छाद्य के ऊपर दो शृंग रक्खें, तो सर्वांग तिलक नाम का प्रासाद होजाता है ॥३२॥ शृंगसंख्या-कोणे ८, प्ररथे १६ रथे ८ उपरथे ८, प्रत्यंग ८, भद्रे और गवाक्षे १६, एक शिखर कुल ६५ शृंग २४-महाभोग प्रासाद- उरुशृङ्गं ततो दद्यान्मत्तालम्बसमन्वितम् । महाभोगस्तदा नाम सर्वकामफलप्रदः ॥३३॥ सर्वांग तिलक प्रासाद के गवाक्ष वाले भद्र के ऊपर एक २ उरुशृंग अधिक चढ़ाने से महाभोग नाम का प्रासाद होता है। यह सब कार्य के फल को देने वाला है ॥३३॥ २५-मेरुप्रासाद- कर्णे रथे प्रतिरथे शृङ्गमुपरथे तथा । मेरुरेष समाख्यातः सर्वदेवेषु पूजितः ॥३४ इति नवाङ्गा नवप्रासादाः । कर्ण, रथ, प्रतिरथ और उपरथ इन सबके ऊपर एक २ शृंग अधिक चढ़ावे तो मेरु नामक प्रासाद होता है, यह सब देवों में पूजनीय है ॥३४॥ प्रासादप्रदक्षिणा का फल-- 'प्रदक्षिणात्रयं कार्यं मेरुप्रदक्षिणायतम् । फलं स्याच्छैलराज्यस्य मेरोः प्रदक्षिणाकृते ॥३५॥ १. 'प्रदक्षिणात्रये स्वर्गं-मेरौ पुंसां च यत्फलम् । इष्टकाशैलजे मेरौ तत्फलं प्रदक्षिणाकृते ॥' इति पाठान्तरे ।