प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
पृष्ठ 144, कुल 278 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमोऽध्यायः १०५ सुवर्ण के मेरु पर्वत की तीन प्रदक्षिणा करने से जो फल होता है, उतना फल इस पाषाण के बने हुये मेरुप्रसाद की तीन प्रदक्षिणा करने से होता है ॥३५॥ वैराज्यप्रमुखास्तत्र नागरा ब्रह्मणोदिताः । वल्लभाः सर्वदेवानां शिवस्यापि विशेषतः ॥३६॥ इति श्री सूत्रधार मण्डनविरचिते प्रासादमण्डने वास्तुशास्त्रे वैराज्यादिप्रासाद- पञ्चविंशत्यधिकारनाम पञ्चमोऽध्यायः ॥५॥* वैराज्यादि यह पचीस प्रासाद नागर जाति के है। ये स्वयं ब्रह्माजी के कहे हुए है। इसलिए ये प्रासाद सब देवो के लिये प्रिय है। उनमे भी महादेवजी तो विशेष प्रिय है ॥३६॥ इति श्री पंडित भगवानदास जैन विरचित प्रासाद मण्डनके वैराज्यादी प्रासाद नामके पांचवे अध्यायकी सुबोधिनी नाम्नी भाषाटीका समाप्ता। *विशेष जानने के लिये देखें अपराजितपृच्छा सूत्र-१५७ प्रा० १४