भारतकोश
प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

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पृष्ठ 147

१०८ प्रासादमण्डने अठारह विभागीय तलमान-- अष्टादशांशे भद्रस्य पार्श्वे द्वे द्वे च नन्दिके । कर्त्तव्ये भागभागेन शेषं स्यात् षोडशांशवत् ॥१०॥ समचोरस तलका अठारह भाग करें। उनमें से भद्र के दोनों तरफ दो २ नन्दी एक २ भाग की बनावें । बाको सब सोलह विभागीय तलमान के बराबर जानें । जैसे—कर्ण दो भाग, कोणी एक भाग, प्रतिरथ दो भाग, नन्दी एक भाग, दूसरी नंदी एक भाग और भद्रार्ध दो भाग, ऐसे अठारह भागीय तलमान जानें ॥१०॥ बीस विभागीय तलमान-- चतुरस्रीकृते क्षेत्रे विंशत्यंशविभाजिते । कर्णौ द्विभागो नन्दिका सार्धांशा पृथुविस्तरे ॥११॥ द्विभागस्तु प्रतिरथो नन्दिका सार्धभागिका । भद्रनन्दी भवेद् भागा भद्रार्धं युग्मभागिकम् ॥१२॥ समचोरस क्षेत्र के बीस भाग करें। उनमे से दो भाग का कर्ण, डेढ़ भाग की कोणी, दो भाग का प्रतिरथ, डेढ़ भाग की नंदिका, एक भाग की भद्रनंदी और दो भाग-का भद्रार्ध, इस प्रकार बीस भागीय तलमान बनावें ॥११-१२॥ बाईस विभागीय तलमान-- द्वाविंशतिकृते१ क्षेत्रे नन्द्ये का भद्रपार्श्वयोः । त्रयः प्रतिरथाः कर्णौ भद्रार्धं च द्वि भागिकम् ॥१३॥ समचोरस क्षेत्र के बाईस भाग करें। उनमे से भद्र के दोनों तरफ की नन्दी एक २ भाग की बनावे । बाकी तीन प्रतिरथ ( रथ, उपरथ और प्रतिरथ ) कर्ण और भद्रार्ध, ये प्रत्येक दो २ भाग का रखे । इस प्रकार बाईस विभागीय तलमान होता है ॥१३॥ तलोंके क्रमसे प्रासाद संख्या-- एकद्वित्रित्रिकं त्रीणि वेदाश्चत्वारि पञ्च च । तलेषु क्रमतोऽष्टासु केऽप्याहुः शिखराणि हि ॥१४॥ १. 'द्वाविंशत्यंशके नन्दी भागैका' ।