प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
पृष्ठ 154, कुल 278 में से
संदर्भ में पढ़ेंषष्ठोऽध्यायः ११३ क्रमशः बीस २ शृंग अधिक चढाये जाते है। जैसे-पांच हाथ के विस्तार वाले मेरु प्रासाद के ऊपर एक सौ एक, छह हाथ के प्रासाद के ऊपर एकसौ इक्कीस, सात हाथ के प्रासाद के ऊपर एकसौ इकतालीस, इस प्रकार बीस २ शृंग बढ़ाते हुए पचास हाथ के मेरु प्रासाद के ऊपर एक हजार एक शृंग हो जाते है ॥३१-३२॥ विमान नागर प्रासाद— केसरिप्रमुखाः कर्णे विमानमुरुशृंगकम् । तथैव मूलशिखरं पञ्चभूमिविमानकम् ॥३३॥ विमाननागरा जाति-स्तदा प्राज्ञैरुदाहृता । एवं शृङ्गैरुरुशृङ्गाणि सम्भवन्ति बहून्यपि ॥३४॥ जिस प्रासाद के कोने के ऊपर केसरी आदि के अनेक शृंग हों, और भद्र के ऊपर उरुशृंग हो, तथा मूल शिखर पांच भूमि (माल) वाला विमानाकार हो, इसको विद्वानो ने विमाननागर जाति का प्रासाद कहा है। इसके ऊपर अनेक शृंग और उरुशृंग होते हैं ॥३३-३४॥ *१-श्रीमेरुप्रासाद और २-हेमशीर्ष मेरुप्रासाद— श्रीमेरुरष्टभागः स्या-देकोत्तरशताण्डकः । हेमशीर्षो दशांशश्च युतः सार्धशताण्डकैः ॥३५॥ पहला श्रीमेरुप्रासाद आठ तलविभक्ति वाला और एकसौ एक शृंग वाला है। दूसरा हेमशीर्ष मेरुप्रासाद दश तल विभक्तिवाला और डेढ़सौ शृंगवाला है ॥३५॥ ३-सुरवल्लभ मेरुप्रासाद— भागैर्द्वादशभिर्युक्तः सार्धद्विशतसंयुतः : सुरवल्लभनामा तु प्रोक्तः श्रीविश्वकर्मणा ॥३६॥ कर्णो द्विभाग एकांशा कोणी सार्धः प्रतिरथः । अर्धांशा नन्दिका भद्र-मर्धं भागेन सम्मितम् ॥३७॥ तीसरा सुरवल्लभ नाम का मेरु प्रासाद बारह तल विभक्ति वाला और दोसौ पचास (ढाईसौ) शृंगवाला है। ऐसा श्री विश्वकर्माजी ने कहा है। कोना दो भाग, कोणी एक भाग,
- ये नव मेरु प्रासाद का स्वरूप सविस्तर जानने के लिए देखो अपराजित पृच्छा सूत्र. १८० प्रा० १५