भारतकोश
प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

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पृष्ठ 156

षष्ठोऽध्यायः ११५ तीन भाग का कोना, एक भाग की कोनी, दो भाग का प्रतिरथ, दो भाग की नंदी और दो भाग का भद्रार्थ रक्खे । इस प्रासाद के ऊपर सातसो पचास शृंग है ॥४२॥ ८-स्वर्णकेतु मेरुप्रासाद- भागैः कर्णादिगर्भान्तं १वेदार्थसार्धत्र्येकांशैः । द्वाभ्यां च स्वर्णकेतुः स्यात् पञ्चसप्ताष्टशृङ्गकैः ॥४३॥ आठवा स्वर्णकेतु नामके मेरु प्रासाद के तलका बाईस भाग करे । इनमे से चार भाग का कोना, आधे भाग की कोणी, साढे तीन भाग का प्रतिरथ, एक भाग की नंदी और दो भाग का भद्रार्थ बनावे । इस प्रासाद के ऊपर आठसौ पच्चहत्तर शृंग है ॥४३॥ ६-वृषभध्वज मेरुप्रासाद- वेदैकरामयुग्मांशै-र्नेत्रैर्जिनविभाजिते । वृषभध्वजमेरुश्च सैकाएडकसहस्रवान् ॥४४॥ नववां वृषभध्वज मेरु प्रासाद के तलका चौबीस भाग करे । इनमे से चार भाग का कोना, एक भाग की कोनी, तीन भाग का प्रतिरथ, दो भाग की नन्दी और दो भाग का भद्रार्थ रक्खे । यह प्रासाद एक हजार एक शृंग वाला है॥४४॥ सभ्रमो भ्रमहीनश्च महामेरुश्च भद्वयम् । सान्धारेषु प्रकर्त्तव्यं भद्रे चन्द्रावलोकनम् ॥४५॥ उपरोक्त नव महामेरु प्रासाद भ्रम ( परिक्रमा ) वाले अथवा विना भ्रमवाले बनाये जाते है । एवं दो भ्रमवाले भी बनाये जाते है । यदि दो भ्रमवाले सान्धार मेरु प्रासाद बनाया जाय तब उसके भद्र मे चंद्रावलोकन करना चाहिये अर्थात् प्रकाश के लिये जाली या गवाक्ष बनाना चाहिये ॥४५॥ राज्ञः स्यात् प्रथमो मेरु-स्ततो हीनो २द्विजादिकः । विना राज्ञोऽन्यवर्णेन कृते मेरौ महद्भयम् ॥४६॥ इति नवमेरुलक्षणम् । इति श्री सूत्रधार मण्डनविरचिते प्रासादमण्डने वास्तुशास्त्रे केसर्यादि प्रासादजातिलक्षणे पञ्चचत्वारिंशन्मेरुलक्षणे षष्ठोऽध्यायः ॥६॥ १. 'वेदासार्ध'त्रिसार्द्धकैः ।' २. 'ऽन्यवर्णजः ।'