भारतकोश
प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

पृष्ठ 162, कुल 278 में से

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सप्तमोऽध्यायः ११६ प्रासादमान से मंडप का माप— समं सपादं पञ्चाशतपर्यन्तं दशहस्तकात् (तः) । दशान्तं पञ्चतः सार्धं द्विपा दोनं चतुष्करे ॥५॥ त्रिहस्ते द्विगुणं द्वयेक-हस्ते कुर्याच्चतुष्किकाम् । प्रायेण मण्डपं सार्धं द्विगुणं प्रत्यलिन्दकैः ॥६॥ दश हाथ से पचास हाथ तक के प्रासाद को समान अथवा सवाया, पांच हाथ से दश हाथ तक के प्रासाद को डेढा, चार हाथ के प्रासाद को पौने दो गुना और तीन हाथ के विस्तार वाले प्रासाद को दुगुना मंडप बनाना चाहिये। दो और एक हाथ के प्रासाद को सिर्फ चौकी बनावे। प्रायः करके मण्डप का प्रमाण डेढ़ा या दुगना अलिन्द के अनुसार जानना चाहिये ॥५-६॥ गूमट के घंटा कलश और शुकनास का मान— मण्डपे स्तम्भपट्टादि-र्मध्यपट्टानुसारतः । शुकनाससमा घण्टा न्यूना श्रेष्ठा न चाधिका ॥७॥ मण्डप मे स्तंभ और पाट आदि सब गर्भगृह के पट्ट आदि के अनुसार रखना चाहिये । मण्डप के गूमट के घंटा कलश की ऊंचाई शुकनास के बराबर रखना चाहिये । कम या अधिक नहीं रखनी चाहिये ॥७॥ अपराजितपृच्छा सूत्र १८५ श्लोक १० मे लिखा है कि—'शुकनाससमा घण्टा न न्यूना न ततोऽधिका ।' अर्थात् गूमट के आमलसार कलश की ऊंचाई शुकनास के बराबर रक्खे । न न्यून न अधिक रक्खे । मंडप के समविषम तल— मुखमण्डपसङ्घाटो यदा भित्त्यन्तरे भवेत् । न दोषः स्तम्भपट्टाद्यैः समं च विषमं तलम् ॥८॥ गर्भगृह और मुखमंडप के बीच मे यदि भित्त (दीवार) का अंतर हो तो मंडप मे स्तंभ, पट्ट और तल ये समविषम किया जाय, तो दोष नहीं है । अर्थात् ऊपर के श्लोक मे कहा है कि- गर्भगृह के पट्ट स्तंभ के अनुसार बराबर मे मंडप के पट्ट स्तंभ आदि रखा जाता है । परन्तु इन दोनो के बीच मे दीवार का अंतर हो तो सम विषम रखा जाय तो दोष नही माना जाता ॥८॥

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