भारतकोश
प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

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१२० प्रासादमण्डने

*मुखमंडप— नवाष्टदशभागेषु त्रिभिश्चन्द्रावलोकनम् । हस्तैकं त्र्यङ्गुलोनं वा तदूर्ध्वं मत्तवारणम् ॥६॥ गर्भगृह के आगे मुखमंडप है, उसके उदयका साढे तेरह, साढे चौदह अथवा साढे पंद्रह भाग करें। उनमें से आठ, नव अथवा दस भाग का चंद्रावलोकन (खुला भाग) रखें। तथा आसनपट्ट के ऊपर एक हाथ का अथवा इक्कीस अंगुल का मत्तवारण (कठहरा) बनावे ॥६॥ सार्धपञ्चांशकैर्भक्तैः सपादं राजसेनकम् । सपादत्र्यंशका वेदी भागेनासनपट्टकम् ॥१०॥ खुले भाग के नीचे से मंडप के तल तक साढे पांच भाग करे। उनमें से सवा भाग का राजसेन, सवातीन भाग की वेदी और एक भाग का आसनपट्ट बनावे ॥१०॥ तदूर्ध्वं सार्धसप्तांशा यावत्पट्टस्य पेटकम् । सार्धपञ्चांशकः स्तम्भः पादोनं भरणां भवेत् ॥११॥ भागार्धं भरणां वापि सपादं सार्धतः शिरः । आसनपट्ट के ऊपर से पाट के तलभाग तक साढे सात भाग करे। उनमें से साढे पांच भाग का स्तम्भ रक्खें। उसके ऊपर पौन अथवा आधे भाग की भरणी और इसके ऊपर सवा या डेढ़ भाग की शिरावटी रखें ॥११॥ पट्टो द्विभागस्तस्योर्ध्वं कर्त्तव्यश्छाद्यकोदयः ॥१२॥ त्रिभागं: ललितं छाद्यं यावत्¹ पट्टस्य पेटकम् । अर्धांशोर्ध्वा कपोतालि-द्विभागः पट्टविस्तरः ॥१३॥ शिरावटी के ऊपर दो भागका पाट रक्खे। उसके ऊपर तीन भाग निकलता और पाट के पेटा भाग तक नमा हुआ सुन्दर छज्जा बनावे। उसके ऊपर आधे भाग की केवल बनावें, पाट का विस्तार दो भाग रक्खे ॥१२-१३॥ मुखमंडप

  • विशेष जानकारी के लिए देखो अपराजितपृच्छा सूत्र १८४ श्लोक ५ से १३ तक १. तत्पेटं पट्टपेटकम् ।