प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तमोऽध्यायः १२६ ऐसे ये बारह प्रकार के मंडप गूढ मंडप के आगे अनेक प्रकार के चौकी वाले किये जाते हैं। तथा ये मंडप समचोरस आदि आकृति वाले और अनेक प्रकार के वितान (चदोवा) वाले होते हैं ॥२४॥ नृत्यमण्डप— त्रिकाग्रे रङ्गभूमिर्या तत्रैव नृत्यमण्डपः । प्रासादाग्रेऽथ सर्वत्र प्रकुर्याच्च विधानतः ॥२५॥ चौकी मंडप के आगे जो रंगभूमि है, उसी भूमि के ऊपर ही नृत्यमंडप किया जाता है। ऐसा सब प्रासादो के आगे बनाने का विधान है ॥२५॥ [चित्र: विभिन्न मण्डप योजनाएँ] (१) १५ यशगेह (६४ स्तंमे) (२) १६ श्रीधर (६४ स्तंमे) (३) १७ वासुकीर्ति (६४ स्तंमे) (४) १८ विजय (६८ स्तंमे) (५) १९ श्रीवत्स (६८ स्तंमे) (६) २० गयोदय (५० स्तंमे) पुष्पकादि मण्डपो (७) २१ गजयश (५२ स्तंमे) (८) २२ सुविभीषक (५६ स्तंमे) (९) २३ कोशक्य (५६ स्तंमे) पुष्पकांक सोमकादि