प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
पृष्ठ 177, कुल 278 में से
संदर्भ में पढ़ें१३० प्रासादमण्डने सप्तविंशति मण्डप— सप्तविंशतिरुक्ता ये मण्डपा विश्वकर्मणा । तलैस्तु विषमैस्तुल्यैः क्षणैः स्तम्भैः समैस्तथा ॥२६॥ प्रथमो द्वादशस्तम्भो द्विद्विस्तम्भविवर्द्धनात् । यावत् षष्टिश्चतुर्युक्ताः सप्तविंशतिमण्डपाः ॥२७॥ श्री विश्वकर्मा ने जो सत्ताईस प्रकार के मंडप कहे है उनके तल सम अथवा विषम कर सकते हैं, परन्तु क्षण (खड ?) और स्तंभ ये सम संख्या मे ही रखना चाहिये। पहला मंडप बारह स्तंभ का है। पीछे दो २ स्तंभ की वृद्धि चौसठ स्तंभ तक बढाने से सत्ताईस मंडप होते है ॥२६-२७॥ विशेष जानने के लिये देखें समरांगण सूत्रधार अध्याय ६७ और अपराजितपृच्छा सूत्र १८६ वा। इन दोनो मे प्रथम मंडप चौसठ स्तंभों का लिखा है, पीछे दो २ स्तंभ घटाने से सत्ताईसवा मंडप बारह स्तंभ का बनाने को कहा है। [चित्र: पुष्पकादि २७ मण्डपो — २४ सुभानन्दन (५८ स्तंभ), २५ सुग्रीव (६० स्तंभ), २६ पुष्पभद्र (६२ स्तंभ), २७ पुष्पक (६४ स्तंभ)] अष्टास्र और षोडशास्र-- क्षेत्रार्धं स्वषडंशोन-मेकास्रेऽष्टास्रमुच्यते । कलास्रः क्षेत्रषड्भागास्तत्षडंशेन संयुतः ॥२८॥