भारतकोश
प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

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पृष्ठ 178

सप्तमोऽध्यायः १३१ क्षेत्र के विस्तार के आधे का छह भाग करे, उनमे से एक भाग कम करके बाकी पांच भाग के मान की अष्टास्र की एक भुजा का मान जाने । यदि पोडशास्र बनाना हो तो क्षेत्र के विस्तार का छह भाग करे। उनमे से एक भाग का छट्ठा भाग विस्तार के छठ्ठे भाग में जोड़ देने से जो मान हो, यही मानकी पोडशास्र की एक भुजा का मान होता है ॥२८॥ वितान (चंदोवा-गूमट)— अष्टास्रं षोडशास्रं च वृत्तं कुर्यात् तदूर्ध्वतः । उदयं विस्तारार्धेन षट् पञ्च सप्त वा भवेत् ॥२६॥ मंडप के चंदोवा का उदय बनाने की क्रिया इस प्रकार है। प्रथम पाट के ऊपर अष्टास्र बना कर उसके ऊपर पोडशास्र बनावे और षोडशास्र के ऊपर गोलाई बनावें। मंडप के विस्तार से आधा वितान का उदय रक्खे । उदय मे पाच छह अथवा सात थर बनावे ॥२९॥ वितान (गूमट) के थर— कर्णाद्दर्दरिका सप्त-भागेन निर्गमोन्नता¹ । रूपकण्ठस्तु पञ्चांशो द्विभागेनात्र² निर्गमः ॥३०॥ १. "निर्गमोच्छूयः ।' २. 'द्विभागोन्नत ।'