भारतकोश
प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

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हे, उन सब का पालन देवायतनो मे भी करना उचित है। चतुर्दश श्लोको मे जिन जिन प्रासादो के आकार देवो ने शकर की पूजा के लिए बनाये उन्ही की अनुकृति पर १४ प्रकार के प्रासाद प्रचलित हुए। उनमे देश-भेद से ८ प्रकार के प्रासाद उत्तम जाति के माने जाते हैं— नागर, द्राविड, भूमिज, लतिन, सावन्धार (सान्धार), विमान-नागर, पुष्पक और मिश्र। लतिन सम्भवत उस प्रकार के शिखर को कहते थे जिसके उर.शृं ग मे लता की आकृति का उठता हुआ रूप बनाया जाता था। शिखरो के ये भेद विशेषकर शृंग और तिलक नामक अलकरणो के विभेद के कारण होते हैं। प्रासाद के लिए भूमि का निरूपण आवश्यक है । जो भूमि चुनी जाय उसमे ६४ या सौ पद का घर बनाने चाहिए । प्रत्येक घर का एक-एक देव होता है जिसके नाम से वह पद पुकारा जाता है । मदिर के निर्माण मे नक्षत्रो के शुभाशुभ का भी विचार किया जाता है। यहा तक कि निर्माण कर्ता के अतिरिक्त स्थापक अर्थात् स्थपति और जिस देवता का मन्दिर हो उनके भी नवाङ्ग नाडी वेध का मिलान आवश्यक माना गया है। काष्ठ, मिट्टी, ईंट, शिला, धातु और रत्न इन उपकरणो से मदिर बनाए जाते हैं इनमे उत्तरोत्तर का अधिक पुण्य है। पत्थर के प्रासाद का फल अनन्त कहा गया है। भारतीय देव प्रासाद अत्यन्त पवित्र कल्पना है। विश्व को जन्म देने वाले देवाधिदेव भगवान का निवास देवगृह या मदिर मे माना जाता है। जिसे वेदो मे हिरण्यगर्भ कहा गया है। वही देव मंदिर का गर्भगृह है। सृष्टि का मूल जो प्राण तत्व है उसे ही हिरण्य कहते हैं। प्रत्येक देव प्राणतत्व है' वही हिरण्य है, “एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति" के अनुसार एक ही देव अनेक देवो के रूप मे अभिव्यक्त होता है। प्रत्येक देव हिरण्य की एक-एक कला है अर्थात् मूल-भूत प्राण तत्त्व की एक-एक रश्मि है। मन्दिर का जो उत्सेध या ब्रह्म सूत्र है वही समस्त सृष्टि का मेरु या यूप है। उसे ही वेदो मे 'बाण' कहा गया है। एक बाण वह है जो स्थूल दृश्य सृष्टि का आधार है और जो पृथिवी से लेकर द्यु लोक तक प्रत्येक वस्तु मे ओत-प्रोत है। द्यावा पृथिवी को वैदिक परिभाषा मे रोदसी ब्रह्माण्ड कहते हैं। इस रोदसी सृष्टि मे व्याप्त जो ब्रह्मसूत्र है वही इसका मूलाधार है। उसे ही वैदिक भाषा मे 'श्रोपश' भी कहा जाता है। बाण, ओपश, मेरु, ब्रह्मसूत्र ये सब समानार्थक है और इस दृश्य जगत् के उस आधार को सूचित करते हैं जिस ध्रुव विन्दु पर प्रत्येक प्राणी अपने जीवन मे जन्म से मृत्यु तक प्रतिष्ठित रहता है। यह मनुष्य शरीर और इसके भीतर प्रतिष्ठित प्राणतत्त्व विश्वकर्मा की सबसे रहस्यमयी कृति है। देव मन्दिर का निर्माण भी सर्वथा इसी की अनुकृति है। जो चेतना या प्राण है। वही देव-विग्रह या देव मूर्ति है और मन्दिर उसका शरीर है प्राण प्रतिष्ठा से पाषाणघटित प्रतिमा देवत्त्व प्राप्त करती है। जिस प्रकार इस प्रत्यक्ष जगत् मे भूमि, अन्तरिक्ष और द्यो, तीन लोक हैं, उसी प्रकार मनुष्य शरीर मे और प्रासाद मे भी तीन लोको की कल्पना है। पैर पृथिवी है, मध्यभाग अन्तरिक्ष है और सिर द्यु लोक है। इसी प्रकार मन्दिर की जगती या अधिष्ठान पादस्थानीय है, गर्भगृह या मण्डोवर मध्यस्थानीय है और शिखर द्यु लोक या शीर्ष-भाग है। यह त्रिक यज्ञ की तीन अग्नियो का प्रतिनिधि है। मूल भूत एक अग्नि सृष्टि के लिए तीन रूपो मे प्रकट हो रही है। उन्हे ही उपनिषदो की परिभाषा मे मन, प्राण और वाक् कहते हैं। वहा वाक् का तात्पर्य पंचभूतो से है क्योकि पंचभूतो मे आकाश सबसे सूक्ष्म है और आकाश का गुण शब्द या वाक् है। अतएव वाक् को आकाशादि पाचो भूतो का प्रतीक मानलिया गया है। मनुष्य शरीर मे जो प्राणाग्नि है वह मन, प्राण और पचभूतो के मिलने से उत्पन्न हुई है (एतन्मयो वाऽयमात्म वाङ् मयो मनोमयः प्राणमय' शतपथ १४।४।३।१०) पुरुष के भीतर प्रज्वलित इस अग्नि को ही वैश्वानर कहते है ( स एपोऽग्निर्वैश्वानरो यत्पुरुष, शतपथ १०।६।१।११)। जो वैश्वानर अग्नि है वही पुरुष है जो पुरुष है वही देव-विग्रह या देवमूर्ति के रूप मे दृश्य होता है। मूर्त और अमूर्त, निसक्त और अनिस्सक्त ये प्रजापति के दो रूप हैं। जो