भारतकोश
प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

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१८ मूर्त्त है वह त्रिलोकी के रूप मे दृश्य और परिमित है। जो अमूर्त्त है वह अव्यक्त और अपरिमित है । जिसे पुरुष के रूप मे वैश्वानर कहा जाता है वही समष्टि के रूप में पृथिवी अंतरिक्ष और द्यु लोक रूपी त्रिलोकी है । "स य स वैश्वानर । इमे स लोका. । इयमेव पृथिवी विश्वमग्निनंरः । अंतरिक्षमेव विश्वं वायुर्नरः । द्यौरेव विश्वमादित्यो नर । शतपथ ६।३।१।३ ।" इस प्रकार मनुष्य देह, अखिल ब्रह्माण्ड और देव प्रासाद इन तीनो का स्वरूप सर्वथा एक-दूसरे के साथ संतुलित एवं प्रतीकात्मक है। जो पिण्ड मे है वही ब्रह्माण्ड मे है और जो उन दोनो में है उसीका मूर्त्तरूप देव-प्रासाद है । इसी सिद्धान्त पर भारतीय देव-मंदिर की ध्रुव कल्पना हुई है । मंदिर के गर्भ गृह मे जो देव विग्रह है वह उस अनादि अनन्त ब्रह्म तत्व का प्रतीक है जिसे वैदिक भाषा मे प्राण कहा गया है ।-जो सृष्टि से पूर्व मे भी था, जो विश्व के रोम-रोम मे व्याप्त है, वही प्राण सबका ईश्वर है । सब उसके वश मे है । सृष्टि के पूर्व की अवस्था मे उसे असत् कहा जाता है और सृष्टि की अवस्था मे उसे ही सत् कहते हैं । देव और भूत ये ही दो तत्त्व हैं जिनसे समस्त विश्व विरचित है। देव, अमृत, ज्योति और सत्य है । भूत मर्त्य, तम और अनृत है । भूत को ही असुर कहते