प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६ जो देव तत्त्व है वही वैदिक भाषा मे अग्नि तत्त्व के नाम से अभिहित किया जाता है। कहा है— 'अग्निः सर्वा देवता' अर्थात् जितने देव हैं अग्नि सबका प्रतीक है। अग्नि सर्वदेवमय है। सृष्टि की जितनी दिव्य या समष्टिगत शक्तिया हैं उन सबको प्राणाग्नि इस मनुष्य देह मे प्रतिष्ठित रखती है। इसी तत्त्व को लेकर देव प्रासादो के स्वरूपका विकास हुआ । जिस प्रकार यज्ञवेदी मे अग्नि का स्थान है उसी प्रकार देव की प्रतिष्ठा के लिए प्रासाद की कल्पना है। देव तत्त्व के साक्षात्कार का महत्वपूर्ण सिद्धान्त यह है कि प्रत्येक प्राणी उसे अपने ही भीतर प्राप्त कर सकता है। जो देव द्यावा पृथिवी के विशाल अंतराल मे व्याप्त है वही प्रत्येक प्राणी के अंत - करण मे है। जैसा कालिदास ने कहा है— 'वेदान्तेषु यमाहुरेकपुरुषं व्याप्य स्थित रोदसी, अन्तर्यश्च मुमुक्षुभिर्नियमितप्राणादिभिर्मृ ग्यते ।, अर्थात् प्राण और मन इन दो महती शक्तियो को नियम बद्ध करके अपने भीतर ही उस देवतत्व का जो सर्वत्र व्याप्त है दर्शन किया जा सकता है। इस अध्यात्म नियम के आधार पर भागवतो ने विशेषतः देव- प्रासादो के भौतिक रूप की कल्पना और उनमे से उस देवतत्त्व की उपासना के महत्वपूर्ण शास्त्र का निर्माण किया । विक्रम की प्रथम शताब्दी के लगभग भागवतो का यह दृष्टिकोण उभर कर सामने आ गया और तद- नुसार ही देव मंदिरो का निर्माण होने लगा । इस सम्बन्ध मे कई मान्यताए विशेष रूप से सामने आईं । उनमे एक तो यह थी कि यद्यपि मनुष्यो की कल्पना के अनुसार देव एक है किन्तु वे सब एक ही मूल भूत शक्ति के रूप हैं और उनमे केवल नामो का अन्तर है । यह वही पुराना वैदिक सिद्धान्त था जिसे ऋग्वेद मे 'यो देवाना नामधा एक एव', अथवा 'एक सद्विप्रा बहुधा वदन्ति', इन वाक्यो द्वारा कहा गया था । नामो के सहस्राधिक प्रपच मे एक सूत्रता लाते हुए भागवतों ने देवाधिदेव को विष्णु की सज्ञा दी । 'वेवेष्टि व्याप्नोति इति विष्णुः', इस निर्वचन के अनुसार यह सज्ञा सर्वथा लोकप्रिय और मान्य हुई । इसी प्रकार वासुदेव आदि अनेक नामो के विषयमे भी उदारदृष्टि से इस प्रकार के निर्वचन किए गए जिनमे नामो के ऐतिहासिक या मानवीय पक्ष को गौण करके उनके देवात्मक या दिव्य पक्ष को प्रधानता मिली । उदाहरण के लिए वासुदेव शब्द की व्युत्पत्ति विष्णुपुराण मे इस प्रकार है— सर्वत्रासौ समस्त च वसत्यत्रेति वै यतः । तत स वासुदेवेति विद्वद्भि परिपठ्यते ॥ (१।२।१२) सर्वाणि तत्र भूतानि वसन्ति परमात्मनि । भूतेषु च स सर्वात्मा वासुदेवस्ततः स्मृतः ॥ (६।५।८०) इसी को महाभारत मे इस प्रकार कहा गया है— ' छादयामि जगत्सर्वं भूत्वा सूर्य इवाशुभि । सर्वभूताधिवासश्च वासुदेवः तत स्मृतः ॥ (शान्तिपर्व, ३४१।४१) वासनात्सर्वभूतानां वसुत्वाद्देवयोनित । वासुदेवस्ततो वेदाः . . . . . ॥ उद्योगपर्व, (७०।३)