प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२० इसी उदात्त धरातल पर शंकराचार्य ने वासुदेव शब्द की इस प्रकार व्युत्पत्ति दी है— "वमति वासयति आच्छादयति सर्वमिति वा वासुः, दीव्यति क्रीडते विजिगीषते व्यवहरति द्योतते स्तूयते गच्छ- तीति वा देवः । वासुश्चासो देवश्चेति वासुदेवः ।" (विष्णु सहस्रनाम' शाङ्कर भाष्य, ४६ श्लोक) इस प्रकार की तरल और तरंगित मन स्थिति भागवतो की विशेषता थी जिसके द्वारा उन्होंने सब धर्मों के समन्वय का राजमार्ग अपनाया। देव के बहुविध नामो के विषय मे उनके दृष्टिकोण का सार यह था- पर्यायवाचकैः शब्दैस्तत्त्वमाद्यमनुत्तमम् । व्याख्यात तत्त्वभावज्ञैरेवं सद्भावचिन्तकैः ॥ (वायु पुराण, ४।४५) अर्थात् समस्त सृष्टि का जो एक आदि कारण है, जिससे श्रेष्ठ और कुछ नही है, ऐसे उस एक तत्त्व को ही तत्त्ववेत्ता अनेक पर्यायवाची शब्दों से कहते हैं। इस सुन्दर दृष्टिकोण के कारण समन्वय और सम्प्रीति के धर्मान्बु मेघ भारतीय महाप्रजा के ऊपर उस समय अभिवृष्ट हुए जब देव-प्रासादो के रूप मे संस्कृति का नूतन विकास हुआ । बौद्ध, जैन और हिन्दू मंदिरों में पारस्परिक स्पर्धा या तनाव की स्थिति न थी किन्तु वे सब एक ही धार्मिक प्रेरणा और स्फूत्ति को मूर्त्तरूप दे रहे थे । गुप्त कालीन भागवती संस्कृति का यह विशाल नेत्र था जिसके द्वारा प्रजाएं अपने-अपने इष्टदेव का अभिलषित दर्शन प्राप्त कर रही थी । मानवी देह के साथ देव तत्त्व के जिस घनिष्ठ संबंध का उल्लेख ऊपर किया गया है उसका दूसरा प्रत्यक्ष फल यह हुआ कि देवालय की कल्पना भी मानुषी देह के अनुसार ही की गई । मानुषी शरीर के जो अंग-प्रत्यग हैं उन्हीं के अनुसार देव मदिरो के मूर्त्तरूप का विधान निश्चित हुआ । किसी समय 'पुरुषविधो वै यज्ञ.' अर्थात् 'जैसा पुरुष वैसा ही यज्ञ का स्वरूप' यह सिद्धान्त मान्य था । उसी को ग्रहण करते हुए 'पुरुष- विधो वै प्रासाद,' अर्थात् जैसा पुरुष वैसा ही देव मन्दिर का वास्तुगत स्वरूप, यह नया सिद्धान्त मान्य हुआ । पाद, खुर, जङ्घा, गर्भगृह, मडोवर, स्कंध, शिखर, ग्रीवा, नासिका, मस्तक, शिखा आदि प्रासाद सबन्धी शब्दा- वली मे मनुष्य और प्रासाद की पारस्परिक अनुकृति सूचित होती है । देव-प्रासादो के निर्माण की तीसरी विशेषता यह थी कि समाज मे कर्मकाण्ड की जो गहरी धार्मिक भावना थी वह देव पूजा या अर्चा के रूप मे ढल गई । प्रत्येक मन्दिर उस-उस क्षेत्र के लिए धर्म का मूर्त्त रूप समझा गया । भगवान् विष्णु अथवा अन्य देव का जो विशिष्ट सौन्दर्य था उसे ही उस-उस स्थान की प्रजाए अपने अपने देवालयो में मूर्त करने का प्रयत्न करती थी । दिव्य अमूर्त्त सौन्दर्य को मूर्त रूप मे प्रत्यक्ष करने का सबल प्रयत्न दिखाई दिया । सुन्दर मूत्ति और मन्दिरो के रूप मे ऐसा प्रतिभासित होता था कि मानो स्वर्ग के सौन्दर्य को पृथिवी के मानव साक्षात् देख रहे हो । जन समुदाय की सम्मिलित शक्ति और राजशक्ति दोनो का सदुपयोग अनेक सुन्दर देव मन्दिरो के निर्माण मे किया गया । यह धार्मिक भावना उत्तरोत्तर बढ़ती गई और एक युग ऐसा आया जब प्रतापी राष्ट्रकूट जैसे सम्राटो का वैभव ऐलोरा के कैलाश सदृश देव मन्दिरो मे प्रत्यक्ष समझा जाने लगा । एक-एक मंदिर मानो एक एक सम्राट के सर्वाधिक उत्कर्ष और समृद्धि का प्रकट रूप था । जन नोक मे इस प्रकार की भावना सिद्ध हुई तभी मध्यकाल मे उस प्रकार के विशाल मंदिर बन सके जिनका वर्णन समरागणसूत्रधार एवं अपराजित पृच्छा ऐसे ग्रंथो मे पाया जाता है। उन्हीं के वास्तु शिल्प की परम्परा सूत्रधार मण्डन के ग्रंथ में भी पाई जाती है। उपासना }