भारतकोश
प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

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२१ मन्दिर या प्रासाद को देवता का आवास माना गया। तब यह कल्पना हुई कि देवता के स्थान पर निरंतर असुरो की वक्र दृष्टि रहती है। अतएव असुरो के निवारण या शांति के लिए पूजा-पाठ करना आवश्यक है । प्रासाद-मण्डन मे इस प्रकार के चौदह शान्ति कर्म या शान्तिक कहे गये हैं। यथा (१) जिस दिन भूमि परीक्षा करने के लिए उसमे खातकर्म किया जाय, (२) जिस दिन कूर्म शिला की स्थापना की जाय, (३) जिस दिन शिलान्यास किया जाय; (४) जिस दिन तल निर्माण या तल-विन्यास के लिए सूत्र-मापन या सूत्र-पातन (सूत्र-छोड़ना) द्वारा पदो के निशान लगाए जाय; (५) जिस दिन सबसे नीचे के थर का पहला पत्थर, जिसे खुर-शिला कहते हैं (फारसी पत्थर खाकन्दाज) रक्खा जाय, (६) जिस दिन मन्दिर द्वार की स्थापना की जाय; (७) जिस दिन मंडप के मुख्य स्तम्भ की स्थापना की जाय, (८) जिस दिन मंडप के स्तम्भो के ऊपर भारपट्ट रक्खा जाय; (६) जिस दिन शिखर की चोटी पर पद्मशिला रक्खी जाय; (१०) जिस दिन गर्भ गृह के शिखर के लगभग बीच मे शुकनासा या नासिका की ऊंचाई तक पहुंच कर झपा सिंह की स्थापना की जाय, (११) जिस दिन शिखर पर हिरण्यमय प्रासाद-पुरुष की स्थापना की जाय, (१२) जिस दिन घण्टा या घूमट पर आमलक रक्खा जाय, (१३) जिस दिन आमलसार शिला के ऊपर कलश की स्थापना की जाय, (१४) और जिस दिन कलश के बराबर मंदिर पर ध्वजा रोपण किया जाय । इनमे सख्या २ और सख्या ३ को कुछ लोग अलग मानते है किन्तु य द कूर्मशिला को एक ही पद माना जाय तो उनकी सूची मे केवल १३ शान्ति कर्म होते हैं और तब चौदहवा शान्तिक देव-प्रतिष्ठा के अवसर पर करना आवश्यक होगा (१।३७-३८) प्रासाद के गर्भ गृह की माप एक हाथ से पचास हाथ तक कही गई है । कु म्भक या जाड्य-कु म्भ या जाडूमा का निकास इसके अतिरिक्त गर्भ गृह की भित्ति के बाहर होना चाहिए । जाड्यकु म्भ आदि विभिन्न थरो का निर्गम तथा पीठ एव छज्जे के जो निर्गम हो उन्हे भी सम सूत्र के बाहर समझना चाहिए । गर्भगृह समरेखा मे चौरस भी हो सकता है, किन्तु उसी मे फालनां या खाचे देकर प्रासाद मे तीन-पाच सात या नौ विभाग किए जा सकते हैं । इसका आशय यह है कि यदि प्रासाद के गर्भगृह की लम्बाई आठ हाथ है तो दोनो ओर दो-दो हाथ के कोण भाग रख कर बीच मे चार हाथ की भित्ति को खाचा देकर थोडा आगे निकाल दिया जा सकता है । इस प्रकार का प्रासाद तीन अगो वाला या उडीसा की शब्दावली मे त्रिरथ प्रासाद कहा जायगा । इसी प्रकार दो कोण, दो खाचे और एक भित्तिरथ वाला प्रासाद पचरथ प्रासाद होता है । .दो कोण, दो-दो उपरथ और एक रथ युक्त प्रासाद सप्ताग, एव दो कोण चार-चार उपरथ एव एक रथिका युक्त प्रासाद नवाग या नवरथ प्रासाद कहलाता है ( १।४१ ) इन फालनाओ या खाचो के अनुसार ही प्रासाद का सम्पूर्ण उत्सेध या उदय खडा किया जाता है। अतएव प्रासाद रचनाओ मे फालनाओ का सर्वाधिक महत्त्व है। खुर-शिला से लेकर शिखर के ऊपरी भाग तक जितने थर एक के ऊपर एक उठते चले जाते हैं उन सबका विभाग इन्ही फालनाओ के अनुसार देखा जाता है । प्रासाद के एक-एक पार्श्व को उसका भद्र कहते है । प्रत्येक भद्र की विविध कल्पना कोण, प्रतिभद्र और बीच वाले भद्राश पर ही निर्भर रहती है । प्रासाद की ऊंचाई मे जहा-जहा फालनाओ के जोड मिलते है वही ऊपर से नीचे तक बरसाती पानी के बहाव के लिए बारीक नालिया काट दी जाती हैं जिन्हे वारिमार्ग या सलिलान्तर कहते है। भद्र, फालना (प्रतिभद्र ) और कर्ण या कोण की सामान्य माप के विषय मे यह नियम बरता जाता है कि भद्र चार हाथ का हो तो दोनो ओर के प्रतिभद्र या प्रतिरथ दो-दो हाथ के और दोनो कर्ण या कोण भी दो हाथ लम्बे रक्खे जाते हैं अर्थात् कर्ण और फालना से भद्र की लम्बाई दुगुनी होती है ।