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प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

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पृष्ठ 23

२२ प्रासाद मण्डन के दूसरे अध्याय मे जगती, तोरण और देवता के स्थापन मे दिशा के नियम का विशेष उल्लेख है, प्रसाद के अधिष्ठान की संज्ञा जगती है। जैसे राजा के लिए सिंहासन वैसे ही प्रासाद के लिए जगती की शोभा कही गई है। प्रासाद के अनुरूप पाच प्रकार की जगती होती है-चतुरस्र (चौरस), आयत (लम्ब चौरस), अष्टास्र (अट्ठंस या अठकोनी), वृत्त (गोल) और वृत्तायत (लम्ब गोल, जिसका एक सिरा गोल और दूसरा आयत होता है, इसे ही द्वयस्र या वेसर कहते हैं)। ज्येष्ठ मध्य और कनीयसी तीन प्रकार की जगती कही गई हैं । जगती की ऊंचाई और लम्बाई की नाप प्रासाद के अनुसार स्थपति को निश्चित करनी चाहिए, जिनका उल्लेख ग्रन्थकार ने किया है। प्रासाद की चौड़ाई से तिगुनी चौगुनी या पांचगुनी तक चौड़ी और मण्डप से सवाई ड्योढ़ी या दूनी लम्बी तक जगती का विधान है । जगती के ऊपर ही प्रासाद का निर्माण किया जाता है अतएव यदि प्रासाद मे एक, दो या तीन भ्रमणी या प्रदक्षिणापथ रखने हो तो उनके लिए भी जगती के ऊपर ही गुंजायश रखी जाती है। जगती के निर्माण में चार, बारह, बीस, अट्ठाइस, या छत्तीस कोण युक्त फालनाओ का निर्माण सूत्रधार मण्डन के समय तक होने लगा था। जगती कितनी ऊंची हो और उसमे कितने प्रकार के गलते-गोचे बनाए जांय इसके विषय मे मण्डन का कथन है कि जगती की ऊंचाई के अट्ठाइस पद या भाग करके उसमे तीन पद का जाड्यकुंभ या जाड्या, दो पद की करणी, तीन पद का दासा जो पद्मपत्र से युक्त हो, दो पद का खुरक, उसके ऊपर सात भाग का कुंभ, फिर तीन पद का कलश, एक भाग का अंतरपत्रक, तीन भाग की कपोतली या केवल, चार भाग का पुष्पकण्ठ या अतराल होना चाहिए। जगती के चारो ओर प्राकार या दीवार और चार द्वार-मण्डप, जल निकालने के लिए मकराकृति प्रणाल, सोपान और तोरण भी इच्छानुसार बनाए जा सकते हैं। मण्डप के सामने जो प्रतोली या प्रवेशद्वार हो उनके आगे सोपान मे शुण्डिकाकृति हथिती बनाई जाती है । तोरण की चौड़ाई गर्भ गृह के पदो की नाप के बराबर और ऊंचाई मन्दिर के भारपट्टो की ऊंचाई के अनुसार रखी जाती है । तोरण मन्दिर का विशेष अंग माना जाता था और उसे भी जगती और उसके ऊपर पीठ देकर ऊंचा बनाया जाना था । तोरण की रचना मे नाना प्रकार के रूप या मूर्तियो की शोभा बनाई जाती थी । तोरण कई प्रकार के होते थे । जैसे घटाला तोरण, तलक तोरण, हिण्डोला तोरण आदि । प्रासाद के सामने वाहन के लिए चौकी ( चतुष्किका ) रखी जाती थी । देव मन्दिर मे वाहन के निर्माण के भी विशेष नियम थे । वाहन की ऊंचाई गर्भारे की मूर्ति के हृत्स्थान, नाभिस्थान या स्तन रेखा तक रखी जा सकती है। शिखर के जिस भाग पर सिंह की मूर्ति बनाई जानी है उसे शुकनासिका कहते है । उस सूत्र से आगे गूढमण्डप, गूढमण्डप से आगे चौकी और उससे आगे नृत्य- मण्डप की रचना होती है। मण्डपो की संख्या जितनी भी हो सब का विन्यास गर्भगृह के मध्यवर्ती सूत्र से नियमित होता है। मंदिर के द्वार के पास त्रिगाला या अलिंद या वलाणक (द्वार के ऊपर का मंडप) बनाया जाता है । पन्द्रहवी शती मे मंदिरो का विस्तार बहुत बढ़ गया था और उसके एक भाग मे रथ यात्रा वाला बड़ा रथ रखने के लिए रथ शाला और दूसरे भाग मे छात्रो के निवास के लिए मठ का निर्माण भी होने लगा था । तीसरे अध्याय मे आगार शिला प्रासाद पीठ, पीठ के ऊपर मंडोवर और मन्दिर के द्वार के निर्माण का विस्तृत वर्णन है। प्रासाद के मूल मे नीव तैयार करने के लिए कंकरीट ( इष्ट का चूर्ण ) की पानी के साथ खूब कुटाई करनी चाहिए । इसके ऊपर खूब मोटी और लम्बी चौड़ी प्रासाद धारिणी शिला या पत्थर का फर्श बनाया जाता है। इसे ही भुर शिला या धर शिला भी कहते हैं। इस शिला के ऊपर जैसा भी प्रासाद बनाना हो उसके अनुरूप सर्व प्रथम जगती या अधिष्ठान बनाया जाता है जिसका उल्लेख पहले

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