प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
२२ प्रासाद मण्डन के दूसरे अध्याय मे जगती, तोरण और देवता के स्थापन मे दिशा के नियम का विशेष उल्लेख है, प्रसाद के अधिष्ठान की संज्ञा जगती है। जैसे राजा के लिए सिंहासन वैसे ही प्रासाद के लिए जगती की शोभा कही गई है। प्रासाद के अनुरूप पाच प्रकार की जगती होती है-चतुरस्र (चौरस), आयत (लम्ब चौरस), अष्टास्र (अट्ठंस या अठकोनी), वृत्त (गोल) और वृत्तायत (लम्ब गोल, जिसका एक सिरा गोल और दूसरा आयत होता है, इसे ही द्वयस्र या वेसर कहते हैं)। ज्येष्ठ मध्य और कनीयसी तीन प्रकार की जगती कही गई हैं । जगती की ऊंचाई और लम्बाई की नाप प्रासाद के अनुसार स्थपति को निश्चित करनी चाहिए, जिनका उल्लेख ग्रन्थकार ने किया है। प्रासाद की चौड़ाई से तिगुनी चौगुनी या पांचगुनी तक चौड़ी और मण्डप से सवाई ड्योढ़ी या दूनी लम्बी तक जगती का विधान है । जगती के ऊपर ही प्रासाद का निर्माण किया जाता है अतएव यदि प्रासाद मे एक, दो या तीन भ्रमणी या प्रदक्षिणापथ रखने हो तो उनके लिए भी जगती के ऊपर ही गुंजायश रखी जाती है। जगती के निर्माण में चार, बारह, बीस, अट्ठाइस, या छत्तीस कोण युक्त फालनाओ का निर्माण सूत्रधार मण्डन के समय तक होने लगा था। जगती कितनी ऊंची हो और उसमे कितने प्रकार के गलते-गोचे बनाए जांय इसके विषय मे मण्डन का कथन है कि जगती की ऊंचाई के अट्ठाइस पद या भाग करके उसमे तीन पद का जाड्यकुंभ या जाड्या, दो पद की करणी, तीन पद का दासा जो पद्मपत्र से युक्त हो, दो पद का खुरक, उसके ऊपर सात भाग का कुंभ, फिर तीन पद का कलश, एक भाग का अंतरपत्रक, तीन भाग की कपोतली या केवल, चार भाग का पुष्पकण्ठ या अतराल होना चाहिए। जगती के चारो ओर प्राकार या दीवार और चार द्वार-मण्डप, जल निकालने के लिए मकराकृति प्रणाल, सोपान और तोरण भी इच्छानुसार बनाए जा सकते हैं। मण्डप के सामने जो प्रतोली या प्रवेशद्वार हो उनके आगे सोपान मे शुण्डिकाकृति हथिती बनाई जाती है । तोरण की चौड़ाई गर्भ गृह के पदो की नाप के बराबर और ऊंचाई मन्दिर के भारपट्टो की ऊंचाई के अनुसार रखी जाती है । तोरण मन्दिर का विशेष अंग माना जाता था और उसे भी जगती और उसके ऊपर पीठ देकर ऊंचा बनाया जाना था । तोरण की रचना मे नाना प्रकार के रूप या मूर्तियो की शोभा बनाई जाती थी । तोरण कई प्रकार के होते थे । जैसे घटाला तोरण, तलक तोरण, हिण्डोला तोरण आदि । प्रासाद के सामने वाहन के लिए चौकी ( चतुष्किका ) रखी जाती थी । देव मन्दिर मे वाहन के निर्माण के भी विशेष नियम थे । वाहन की ऊंचाई गर्भारे की मूर्ति के हृत्स्थान, नाभिस्थान या स्तन रेखा तक रखी जा सकती है। शिखर के जिस भाग पर सिंह की मूर्ति बनाई जानी है उसे शुकनासिका कहते है । उस सूत्र से आगे गूढमण्डप, गूढमण्डप से आगे चौकी और उससे आगे नृत्य- मण्डप की रचना होती है। मण्डपो की संख्या जितनी भी हो सब का विन्यास गर्भगृह के मध्यवर्ती सूत्र से नियमित होता है। मंदिर के द्वार के पास त्रिगाला या अलिंद या वलाणक (द्वार के ऊपर का मंडप) बनाया जाता है । पन्द्रहवी शती मे मंदिरो का विस्तार बहुत बढ़ गया था और उसके एक भाग मे रथ यात्रा वाला बड़ा रथ रखने के लिए रथ शाला और दूसरे भाग मे छात्रो के निवास के लिए मठ का निर्माण भी होने लगा था । तीसरे अध्याय मे आगार शिला प्रासाद पीठ, पीठ के ऊपर मंडोवर और मन्दिर के द्वार के निर्माण का विस्तृत वर्णन है। प्रासाद के मूल मे नीव तैयार करने के लिए कंकरीट ( इष्ट का चूर्ण ) की पानी के साथ खूब कुटाई करनी चाहिए । इसके ऊपर खूब मोटी और लम्बी चौड़ी प्रासाद धारिणी शिला या पत्थर का फर्श बनाया जाता है। इसे ही भुर शिला या धर शिला भी कहते हैं। इस शिला के ऊपर जैसा भी प्रासाद बनाना हो उसके अनुरूप सर्व प्रथम जगती या अधिष्ठान बनाया जाता है जिसका उल्लेख पहले
२३ हुआ है। यदि विशेष रूप से जगती का निर्माण संभव न हो तो भी पत्थर की शिलाओ के तीन थर एक के ऊपर एक रखने चाहिए। इन थरो को भिट्ट कहा जाता है। नीचे का भिट्ट दूसरे की अपेक्षा कुछ मोटा और दूसरा तीसरे मे कुछ मोटा रक्खा जाता है। भिट्ट जितना ऊचा हो उसका चौथाई निर्गम या निकास किया जाता है। भिट्ट या जगती के ऊपर प्रासाद पीठ का निर्माण होता है। प्रासाद-पीठ और जगती का भेद स्पष्ट समझ लेना चाहिए । जगती के ऊपर मध्य मे बनाए जाने वाले गर्भ गृह या मडोवर की कुर्सी की संज्ञा प्रासाद पीठ है। इस पीठ की जितनी ऊंचाई होती है उसी के बराबर गर्भ गृह का फर्श रक्खा जाता है । प्रासाद पीठ के निर्माण के लिए भी गोले गलतो का या विभिन्न थरो का विधान है। जैसे नौ अंश का जाड्यकु भ, सात भाग की करणी, कपोतालि या केवल के साथ सात भाग की ग्रामपट्टी (जिसमें सिंह मुख की आकृति बनी रहती है। और फिर उनके ऊपर बारह भाग का गज थर, दश भाग का अश्व थर और आठ भाग का नर थर बनाया जाता है। प्रत्येक दो थरो के बीच मे थोडा-अतराल देना उचित है और ऊपर नीचे दोनो और पतली कर्णिका भी रक्खी जा सकती है। प्रासाद पीठ के ऊपर गर्भ गृह या मडोवर बनाया जाता है जिसे वास्तविक रूप मे प्रासाद का उदय भाग कहना चाहिए । मण्ड का अर्थ है पीठ या आसन और जो भाग उसके ऊपर बनाया जाता था उसके लिए मण्डोवर यह सज्ञा प्रचलित हुई । मडोवर के उत्सेध या उदय को १४४ भागो मे बाटा जाता है। यह ऊंचाई प्रासाद पीठ के मस्तक से छज्जे तक ली जाती है। इसके भाग ये है—खुरक ५ भाग, कुम्भक २० भाग, कलश ८ भाग, अतराल २॥ भाग, कपोतिका या कपोतालि ८ भाग, मची ६ भाग, जङ्घा ३५ भाग, उरुजघा (उद्गम) १५ भाग है (जिसे गुजराती मे 'डौढिया' भी कहा जाता हैं), भरणी ८ भाग, शिरावटी या शिरापट्ट १० भाग, ऊपर की कपोतालि ८ भाग, अंतराल ढाई भाग और छज्जा १३ भाग । इस प्रकार १४४ भाग मडोवर के उदय मे रखे जाते है। छज्जे का बाहर की ओर निकलता जाता दश भाग होता है । एक विनेप प्रकार का मडोवर मेरु मडोवर कहलाता है, उसमे भरणी के ऊपर से ही ८ भाग की मञ्ची देकर २५ भाग की जघा बनाई जाती है और फिर छज्जे के ऊपर ७ भाग की एक मञ्ची देकर १६ भाग की जघा बनाते है। उसके ऊपर ७ भाग की भरणी, ४ भाग की शिरावटी, ५ भाग का भारपट्ट और फिर १२ भाग का कूट छाद्य या छज्जा । इस प्रकार, मडोवर की रचना मे तीन जघायें और दो छज्जे बनाये जाते थे । प्रत्येक जङ्घा मे भिन्न भिन्न प्रकार को मूर्तिया उत्कीर्ण की जानी है। आमेर के जगत शरणजी के मदिर मे मेरु मडोवर की रचना की गई हैं। एक दूसरे के ऊपर जो थरो का विन्यास है उनमे निर्गम और प्रवेश का अर्थात् बाहर की ओर निकलता जाता और भीतर की ओर दबाव रखने के भी नियम दिए गए हैं, मंडन का कथन है कि यदि प्रासाद निर्माण मे अल्प द्रव्य व्यय करना हो तो तीन जङ्घाओ मे से इच्छानुसार जघा, रूप या मूर्तियो का निर्माण छोडा भी जा सकता है ( ३।२८ )। ईटो से बने मंदिर मे भीत की चौडाई गर्भ गृह की चौडाई का चौथा भाग और पत्थर के मदिर मे पाचवा भाग रखनी चाहिए। गभारा बीच मे चौरस (युगास्र) रखकर उसके दोनो ओर फालनाए देनी चाहिए, जिनका उल्लेख ऊपर किया जा चुका है। मडन ने फालनाओ के लिए भद्र सुभद्र और प्रतिभद्र शब्दो का प्रयोग किया है। उन्ही के लिए उत्कल की शब्दावली मे रथ, अनुरथ, प्रतिरथ, कोणरथ शब्द आते है । मडोवर और उसके सामने बनाये जाने वाले मडपो के खम्मो की ऊंचाई एक दूसरे के साथ मेल मे रखनी आवश्यक है। मंडप के ऊपर की छत या गूमट को करोट कहा गया है। इस करोट की ऊँचाई मडप की
चौड़ाई मे आधी रखनी चाहिए। इस करंट या छत मे नीचे की ओर जो कई थर बनाये जाने है उन्हे दर्दरी कहा जाता था, गूमट के भीतरी भाग को वितान और ऊपरी भाग को सम्बरण कहते हैं। वितान में दर्दरी या थरो की सख्या विषम रखने का विधान है। इसके अनंतर मंदिर के द्वार का सविस्तर वर्णन है (३।३७-६६)। द्वार के चार भाग होते हैं अर्थात नीचे देहली या उदुम्बर, दो पार्श्व स्तम्भ और उनके ऊपर उत्तरंग या सिरदल । इन चारो को ही शिल्पी अनेक अलंकरणो मे युक्त करने का प्रयत्न करते थे। देवगढ़ के दशावतार मंदिर का अलंकृत द्वार एक ऐसी कृति है जिसकी साज-सज्जा ने शिल्पियों ने अपने कौशल की पराकाष्ठा दिखाई है। प्रायः गुप्त युग में उसी प्रकार के द्वार बनते रहें। शनैः शनैः मध्यकालीन मंदिरो में द्वार निर्माण कला में कुछ विकास और परिवर्तन भी हुआ । मंडन के अनुसार उदुम्बर या देहली की चौड़ाई के तीन भाग करके बीच में मन्दारक और दोनो पाश्र्वों मे ग्रास या सिंहमुख बनाने चाहिए। मन्दारक के लिए प्राचीन शब्द सन्तानक भी था (अंग्रेजी फेस्टून) । गोल सन्तानक मे पद्मपत्रो से युक्त मृणाल की आकृति उकेरी जाती थी। ग्रास या सिंह मुख को कीर्तिवक्त्र या कीर्तिमुख भी कहते थे । देहली के दोनो ओर के पार्श्व स्तम्भो के नीचे तलरूपक (हिन्दी-तलकड़ा) नाम के दो अलकरण बनाये जाते हैं। तलकड़ो के बीच मे देहली के सामने की ओर बीच के दो भागों मे अर्धचन्द्र और उसके दोनो ओर एक-एक गगारा बनाया जाता है। गगारी के पास मे शंखो की और पद्मपत्र की आकृति उत्कीर्ण की जाती हैं। द्वार की यह विशेषता गुप्त युग ते ही आरम्भ हो गई थी, जैसा कालिदास ने मेघदूत मे वर्णन किया है (द्वारोपान्ते लिखितवपुषौ शंखपद्मौ च दृष्ट्वा, उत्तर मेघ १७) । गगारक या गगारा शब्द की व्युत्पत्ति स्पष्ट नही है। यहां पृष्ठ ५६ और वास्तुसार मे पृ० १४० पर गगारक का चित्र दिया गया है। द्वार की ऊंचाई से उसकी चौड़ाई आधी होनी चाहिए। और यदि चौड़ाई मे एक कला या सोलहवा अंश बढ़ा दिया जाय तो द्वार की शोभा कुछ अधिक हो जाती है, द्वार के उत्तरग या सिरदल भाग मे उस देव की मूर्ति बनानी चाहिए जिसकी गर्भगृह मे प्रतिष्ठा हो। इस नियम का पालन प्रायः सभी मंदिरो मे पाया जाता है। इस मूर्ति को ललाट-विम्ब भी कहते थे। द्वार के दोनो पार्श्व स्तम्भो में कई फालना या भाग बनाये जाते थे जिन्हें सस्कृत मे शाखा कहा गया है। इस प्रकार एक शाख, त्रिगाख, पंच शाख, सप्त शाख, और नव शाख, तक के पार्श्व स्तम्भ युक्त द्वार बनाये जाते थे। इन्ही के लिए तिसाही, पंचसाही आदि शब्द हिन्दी में अभी तक प्रचलित है। सूत्रधार मंडन ने एक नियम यह बताया है कि गर्भगृह की दीवार मे जितनी फालना या अंग बनाये जाय उतनी ही द्वार के पार्श्व स्तम्भ मे शाखा रखनी चाहिए (शाखाः स्युरंग तुल्यकाः ३।५६) । द्वार स्तम्भ की सजावट के लिए कई प्रकार के अलंकरण प्रयुक्त किये जाते थे। उनमे रूप या स्त्री पुरुषों की मूर्तियां मुख्य थी। जिस भाग मे ये आकृतियां उकेरी जाती थी उसे रूप स्तम्भ या रूप शाखा कहते थे। पुष्प संज्ञक और स्त्री सज्ञक शाखाओ का उल्लेख मण्डन ने किया हैं। इस प्रकार की शाखाये गुप्तकालीन मंदिर द्वारो पर भी मीननी हैं। अलकरणो के अनुसार इन शाखाओ के और नाम भी मिलते हैं जैसे-पत्रशाखा, सिंह शाखा, गन्धर्व शाखा, रूप शाखा आदि । खल्व शाखा पर जो अलंकरण बनाया जाता था वह मटर आदि के बेलो मे रहते हुए गोल प्रतानो के सदृश होता था। आबू के विमलवसही आदि मंदिरो मे तथा अन्यत्र भी इसके उदाहरण हैं। खल्व शब्द प्राचीन था और उसका अर्थ फलिनीलता या मटर आदि की वेल के लिए प्रयुक्त होता था। प्रासाद मडन के चौथे अध्याय मे प्रारम्भ मे प्रतिमा की ऊंचाई बताते हुए फिर शिखर निर्माण का ब्योरे दार वर्णन किया गया है। देव प्रासादो के निर्माण मे शिखरो का महत्वपूर्ण स्थान था । मंदिर के वास्तु मे नाना प्रकार के शिखरो का विकास देखा जाता है। शिखरों की अनेक जातियां शिल्प ग्रंथों मे कही
२५ गई है । वास्तविक प्रासाद शिखरो के साथ उन्हें मिलाकर अभी तक कोई अध्ययन प्रस्तुत नही किया गया है । बाण ने सातवीं शती में बहुभूमिक शिखरो का उल्लेख किया है । प्रारम्भिक गुप्तकाल में बने हुए साची के छोटे देव मन्दिर में कोई शिखर नही है । देवगढ के दशावतार मंदिर में शिखर के भीतर का ढोला विद्यमान है । यह इस बात का साक्षी है कि उस मंदिर पर भी शिखर की रचना की गई थी । शिखर का आरम्भ किस रूप में और कब हुआ यह विषय अनुसंधान के योग्य है । पंजाब में मिले हुए उदुम्बर जनपद के सिक्को पर उपलब्ध देवप्रासाद के ऊपर त्रिभूमिक शिखर का स्पष्ट अंकन पाया जाता है । इससे यह सिद्ध होता है कि शिखरो का निर्माण गुप्त युग से पहले होने लगा था । ज्ञात होता है कि मंदिर के वास्तु में दोनो प्रकार मान्य थे । एक शिखर युक्त गर्भ गृह या मण्डप या और दूसरे शिखर विहीन चौरसछत वाले सादा मंदिर जैसे साची और मानवा के मुन्दरा आदि स्थानों में मिले है । इस प्रकार के मदिरो के विकास का पूर्वरूप कुषाण कालीन गन्धकुटी में प्राप्त होता है, जिसमे तीन खडे पत्थरों को चौरस पत्थर से पाट कर उसके भीतर बुद्ध या बोधिसत्व की प्रतिमा स्थापित कर दी जाती थी । कालान्तर में तो शिखर मदिरो का अनिवार्य अंग बनगया और उसकी शोभा एव रूप विधान में अत्यधिक ध्यान दिया जाने लगा । मंदिर के गर्भ गृह में खडी हुई या बैठी हुई देव प्रतिमा की उचाई कितनी हो और उसका दृष्टि सूत्र कितना ऊचा रखा जाय इसके विषय में द्वार की ऊंचाई के अनुसार निर्णय किया जाता था । जैसे एक विकल्प यह था कि द्वार की ऊंचाई के आठ या नव भाग करके, एक भाग छोडकर शेष ऊंचाई के तीन भाग करके उनमे में दो के बराबर मूर्ति की ऊंचाई रखनी चाहिए ।
मंदिर में शिखर की रचना अत्यन्त जटिल विषय है । मडोवर के छज्जे के ऊपर दो एक थर और लगाकर नव शिखर का प्रारम्भ करते है । वास्तुसार में इन थरो के नाम वेराडू और पहाडू कहे है (वास्तुसार पृ ११८) किन्तु मडन ने केवल पहार नामक थर का उल्लेख किया है । शिखर के उठते हुए विन्यास में शृगो की रचना सबसे अधिक महत्वपूर्ण है । मटोवर की विभिन्न फालनाओ की ऊंचाई स्कन्ध के बाद जब शिखर में उठती है तो कोण, प्रतिरथ और रथ आदि की सीध में शृग बनाये जाते है । इन्ही शृगो के द्वारा शिखर का ठाठ जटिल और सुन्दर हो जाता है । बीच के शिखर को यदि हम एक ईकाई मानें तो उसकी चारो दिशाओ में चार उरुशृग बनाये जा सकते है । ये शृग भी शिखर की आकृति के होते हैं । यदि मूल शिखर का सामने से दर्शन किया जाय तो वही आकृति शृग की होती है । प्रासाद के शिखर का सम्मुख दर्शन ही शृग है । मूल शिखर और उसके चारो ओर के चार शृग इस प्रकार कुल ५ शृग युक्त रूप प्रासाद का एक सीधा प्रकार हुआ । बीच के शिखर को मूलमजरी और चारो ओर के मूलभूत बडे शृगो को उरुशृग कहते है । इसी के लिए राजस्थानी और गुजराती रथपतियों में छातियाशृग शब्द भी प्रचलित है । वस्तुत. शृग और शिखर पर्यायवाची [L2
२६ रखना चाहिये । इस अनुपात से शिखर सुहावना प्रतीत होता है । गर्भ गृह की मूलरेखा या चौड़ाइ से शिखर का उदय सवाया रक्खा जाता है । शिखर के वलण अर्थात् नमन की युक्ति साधने के लिए उसके उदय भाग मे और स्कन्ध मे क्रमश: रेखाओ और कलाओ की सूक्ष्म गणना स्थपति सम्प्रदाय मे प्रचलित है । उस विषय का संक्षिप्त संकेत मंडन ने किया है । रेखाओ और कलाओ का यह विषय अपराजित पृच्छा (प्र. १३६-१४१) मे भी आया है । खेद है कि यह विषय अभी तक स्पष्ट न होने से इस पर अधिक प्रकाश डालना सम्भव नही । मडन का कथन है कि खरशिला से कलश तक बीस भाग करके आठ या ८½ या ६ भाग मे मंडोवर की ऊचाई और शेष मे शिखर का उदय रक्खा जाता है । शिखर के गूमट नुमा उठान को पद्मकोश कहा जाता है (४।२३) पद्मकोश की आकृति लाने के लिये मडन ने अति संक्षिप्त रीति से एक युक्ति कही है (चतुर्गुणेन सूत्रेण सपाद. शिखरोदय: (४।२३) इसके अनुसार शिखर की मूलरेखा मे चौगुना सूत्र लेकर यदि नये प्राप्त दोनो बिन्दुओ को केन्द्र मानकर गोल रेखाये खीची जाय तो जहा वे एक दूसरे को काटती हो वह शिखर का अतिम विन्दु हुआ । शिखर की मूल रेखा से उसकी (मूल रेखा की) सवाई जितनी ऊंचाई पर एक रेखा खीची जाय तो वह शिखर का स्कन्ध स्थान होगा । इस स्कन्ध और पद्मकोश के अंतिम बिन्दु तक की ऊंचाई के सात भाग करके एक भाग मे ग्रीवा, १½ भाग मे आमलक शिला, १½ भाग मे पद्मपत्र (जिन्हे आजकल लीलोफर कहते है), और तीन भाग मे कलश का मान रहेगा । शिखर मे शुकनास का भी महत्त्वपूर्ण स्थान है । शुकनास की ऊंचाई के पाच विकल्प कहे है । अर्थात् छज्जे से स्कन्ध तक के उदय को जब इक्कीस भागो मे बाटा जाय तो ६, १०, ११, १२, १३, अंशो तक कही भी शुकनास का उच्छ्रय किया जा सकता है। शुकनासिका के उदय के पुन: नव भाग करके १, ३, ५, ७, या ६ भागो मे कही पर भी झम्पार्सिंह रखना चाहिये। शुकनासा, प्रासाद या देव मदिर की नासिका के समान है । शिखर मे शुकनासिका का निकलता खाता नीचे के अंतराल मण्डप के अनुसार बनाया जाता है । अंतराल मण्डप को कपिली या कौली मण्डप भी कहते है । (४।२७) अन्तराल मडप की गहराई छ: प्रकार की बताई गई है । शिखर की रचना मे शृ ग, उरुशृंग (छातिया शृ ग), प्रत्यग और अण्डको का महत्त्वपूर्ण स्थान है । एव भिन्न भिन्न प्रकार के शिखरो के लिए उनकी गणना अलग २ की जाती है । इसी प्रकार तवग, तिलक और सिहकर्ण ये भी प्रकारान्तर के अलकरण है जिन्हे प्रासाद के शिखर का भूषण कहा जाता है और इनकी रचना भी शिखर को विभिन्नता प्रदान करती है । मडन के अनुसार प्रासाद के शिखर पर एक हिरण्यमय प्रासाद पुरुष की स्थापना की जाती है । कलश, दण्ड, और ध्वजारोपण के सबध मे भी विवरण पाया जाता है । पाचवें-छठे अध्यायो मे वैराज्य आदि पच्चीस प्रकार के प्रासादो के लक्षण कहे गए हैं । गर्भ गृह - के कोण से कोण तक प्रासाद के विस्तार के ४ से ११२ तक आवश्यकतानुसार भाग किए जा सकते है और उन्ही भागो के अनुसार फालनाओ के अनेक भेद किए जाते हैं । प्रासादो के नाम और जातिया उनके शिखरो के अनुसार कही गई है । वस्तुत: इन भेदो के आधार पर प्रासादो की सहस्रो जातिया कल्पित की जाती हैं । गर्भ गृह,
२७ आदि प्रासादो का निरूपण किया गया है। प्रयोगात्मक दृष्टि से यह विषय अत्यधिक विस्तार को प्राप्त हो गया था । यहा तक कि मेरु-प्रासाद मे ५०१ शृग तक बनाए जाते थे। वृषभध्वज नामक मेरु मे एक-सहस्र एक अण्डक कहे गये है। मेरु प्रासाद बहु व्यय साध्य होने से केवल राजकीय निर्माण का विषय समझा जाता था । ७ वें अध्याय मे, मण्डपो के निर्माण की विधि दी गई है। १० हाथ से ५० हाथ तक की चौडाई के सम या सपाद मण्डप बनाए जाते थे । जैन मन्दिरो मे गूढमण्डप, चौकी मण्डप, नृत्य मण्डप, इन तीनो मण्डपो का होना आवश्यक माना गया है। मण्डप के ऊपर की छत घण्टा कहलाती थी जिसे हिन्दी मे गूमट कहते है। इसके ऊपर के भाग को सवरण और नीचे के भाग को वितान कहते थे । मडप के निर्माण मे स्तम्भो का विशेषतः विधान किया गया है। ४, ८, १२ या २० कोने तक के स्तम्भ अथवा गोल स्तम्भ बनाए जाते थे । स्तम्भो की सख्या के भेद से २७ प्रकार के मण्डप कहे गए है। १२ स्तम्भो से लेकर २-२ की वृद्धि करते हुए ६४ स्तम्भो तक के मण्डपो का उल्लेख है। गूमट की छत के वितान को दर्दरी, रूपकण्ठ, विद्याधर, नर्तकी, गजतालु, कोल आदि अलकरणो से युक्त थरो से सुशोभित किया जाता था, एक से एक विचित्र वितानो के निर्माण मे भारतीय शिल्पाचार्यो ने अपने कौशल का परिचय दिया था । यहा तक कि एक हजार एक सो तेरह प्रकार के वितान कहे गये है। गूमट के ऊपरी भाग या सवरण के सजावट मे घण्टी का अलकरण मुख्य था । न्यूनातिन्यून पाच घटियो से लेकर ४-४ की सख्या बढाते हुए एक सौ एक घंटियो तक की गिनती की जाती थी । आठवे अध्याय मे मदिरो के एव वापी-कूप-तडागादि के जीर्णोद्धार की विधि कही गई है। साथ ही राजपुर आदि नगरो के निर्माण को सौध, जाल-गवाक्ष, कीर्ति स्तम्भ, जलाराम आदि से सुशोभित करने का वर्णन आया है। इसी प्रकार कोष्ठागार, मत्तवारणी, महानस, पुण्यशाला, आयुधशाला, छात्रागार, जल स्थान, विद्या मण्डप, व्याख्यान मण्डप आदि के निर्माण का विधान भी किया गया है । इस प्रकार सूत्रधार मण्डन ने अपने वास्तुसार सबन्धी इस ग्रथ मे सक्षिप्त शैली द्वारा प्रासाद रचना सबन्धि विस्तृत जानकारी भरने का प्रयत्न किया है। इस ग्रथ का पठन-पाठन मे अधिक प्रचार होना उचित है । श्री प भगवानदास जैन ने अनुवाद और चित्रमय व्याख्या के द्वारा इस ग्रथ को सुलभ बनाने का जो प्रयत्न किया है इसके लिए हमे उनका उपकार मानना चाहिए । व्यक्तिगत रीति से हम उनके ओर भी आभारी , है क्योकि आज से कई वर्ष पूर्व जयपुर मे रहकर हमे उनसे इस ग्रथ के साक्षात् अध्ययन का अवसर प्राप्त हुआ था । विदित हुआ है कि इस ग्रन्थ का वे हिन्दी भाषान्तर भी प्रकाशित करना चाहते हैं। आशा है उस सस्करण मे विषय को स्पष्ट करने वाले रेखाचित्रो की संख्या मे और भी वृद्धि सभव होगी । वासुदेवशरण अग्रवाल अध्यक्ष-कला वास्तु विभाग ता० १-१-६२ काशी विश्व विद्यालय
विषयानुक्रमणिका विषय पृष्ठ विषय पृष्ठ मंगलाचरण ... १ शिला और कूर्म का स्थापन क्रम ... १७ देव पूजित शिव स्थान ... २ शिला के नाम ... १८ प्रासाद की जाति ... २ धरणी शिला का मान ... १८ आठ जाति के उत्तम प्रासाद ... ३ धरणी शिला ऊपर के रूप ... २० प्रासाद का निर्माण समय ... ४ सूत्रारंभ नक्षत्र ... २१ भूमि परीक्षा ... ४ शिला स्थापन नक्षत्र ... २१ वास्तु मंडल लिखने का पदार्थ ... ४ देवालय का निर्माण स्थान ... २१ आठ दिक्पाल ... ५ प्रासाद निर्माण पदार्थ ... २२ कार्यारंभ के समय पूजनीय देव ... ५ देव स्थापन का फल ... २२ निषेध समय ... ५ देवालय बनाने का फल ... २२ वत्समुख ... ५ वास्तु पूजा का सप्त स्थान ... २२ आय आदिका विचार ... ७ शान्ति पूजा का चौदह स्थान ... २३ देवालय मे विचारणीय ... ७ प्रासाद का प्रमाण ... २३ आय व्यय और नक्षत्र लाने का प्रकार ... ७ मण्डोवर के थरो का निर्गम ... २३ आयो की सज्ञा और दिशा ... ८ प्रासाद के अंगो की संख्या ... २३ प्रासाद के प्रशस्त आय ... ८ फालनाओ का सामान्य मान ... २४ व्यय संज्ञा ... ८ राशि, योनि, नाडी, गण, चंद्रमा आदि दूसरा अध्याय जानने का शतपद चक्र ... ९-१० जगती ... २५ ध्वजाय और देवगण नक्षत्र वाले , जगती का आकार ... २५ समचोरस क्षेत्र का नाप ... ११ जगति का विस्तार मान . २५ ऋण लाने का प्रकार ... १२ मण्डप की जगती ... २६ दिक् साधन .. १२ भ्रमणी ( परिक्रमा ) .... २७ दिक् साधन यंत्र ... १४ जगती के कोने .... २७ खात विधि ... १४ जगती की ऊंचाई का मान .... २७ नाग वास्तु ... १४ जगती के उदय का थर मान .... २८ राहु (नाग) मुख ... १५ जगती के आभूषण .... २८ कूर्ममान ... १६ जगती का दिग्दर्शन रेखाचित्र .... २६ अपराजित के मत से कूर्म का मान् ... १६ देव के वाहन का स्थान .... ३० धीरार्णव के मत मे कूर्ममान ... १७ देव के वाहन का उदय .... ३० कूर्म का ज्येष्ठ और कनिष्ठ मान ... १७ देव के वाहन का दृष्टि स्थान .... ३१
२६ विषय पृष्ठ विषय पृष्ठ जिनप्रासाद के मंडपो का क्रम .... ३१ प्रासाद के उदय से पीठका उदयमान .... ४८ जिनप्रासाद मे देवकुलिका का क्रम .. ३१ १४४ भाग का मंडोवर (दीवार) ... ४९ बावन जिनालय .... ३२ १४४ भाग के मडोवर का दिग्दर्शन ... ५१ बहत्तर देवकुलिका ... ३२ चार प्रकार की जंघा ... ५२ चौबीस देवकुलिका .... ३२ मेरु मंडोवर और उसका चित्र ... ५३ रुप और मठाका स्थान .... ३२ सामान्य मंडोवर का चित्र . ५४ शिवलिंग के आगे अन्य देव ... ३३ सामान्य मंडोवर . ५५ देव के सम्मुख न्यदेव ... ३३ २७ भाग का मडोवर सचित्र .. ५५ परस्पर दृष्टिबंध ... ३४ मडोवर की मोटाई . ५५ दृष्टिबंध का परिहार ... ३४ शुभाशुभ गर्भगृह .... ५६ शिवस्नानोदक .... ३४ लव चौरस शुभ गर्भगृह ... ५७ देवो की प्रदक्षिणा ... ३५ स्तंभ और मडोवर का समन्वय ... ५७ जनमार्ग (पनाला) .. ३५ गर्भगृह के उदय का मान और गूम्बज .... ५७ मण्डप स्थित देवो की नाली .. ३६ उदुम्बर (देहली) की ऊंचाई ... ५८ पूर्व और पश्चिमाभिमुखदेव .. ३६ उदुम्बर की रचना ... ५८ दक्षिणाभिमुखदेव .. ३७ कुम्भा से हीन उदुम्बर और तल ... ५८ पश्चिमाभिमुख देव .. ३७ अर्द्धचन्द्र (शखावत्र्त) .. ६० सूर्य आयतन ... ३७ उत्तरंग .. ६१ गणेश आयतन ... ३८ नागरप्रासाद का द्वारमान ... ६२ विष्णु आयतन ... ३८ भूमिजादि प्रासाद का द्वारमान ... ६३ चण्डी आयतन ... ३८ द्राविड़ प्रासाद का द्वारमान ... ६४ शिव पञ्चायतन ... ३८ अन्यजाति के प्रासाद का द्वारमान ... ६४ त्रिदेव स्थापन क्रम ... ३९ द्वार शाखा ... ६४ त्रिदेवो का न्यूनाधिकमान ... ३९ शाखा के आय ६५ शाखा से द्वार का नाम और परिचय ६५ तीसरा अध्याय त्रिशाखा द्वार का चित्र ६६ न्यूनाधिक शाखामान ६७ प्रासाद धारिणी तरशिला . ४१ त्रिशाखा ६७ तरशिला का मान ... ४१ शाखा स्तंभ का निर्गम . ६७ भिट्टमान .... ४२ शाखोदर का विस्तार और प्रवेश ६७ भिट्ट का निर्गम . ४२ त्रि पंच सप्त नव शाखा का चित्र ६८ पीठ का उदयमान ... ४३ शाखा के द्वारपाल का मान . ६८ पीठोदय का थरमान . . ४५ शाखाके रूप ६९ थरो का निर्गम मान ... ४६ पञ्च शाखा ६९ कामपीठ और कणपीठ ... ४६ सप्त शाखा . . ७० प्रासाद का उदयमान (मडोवर) .... ४७
३० विषय पृष्ठ विषय पृष्ठ नव शाखा ७० सुवर्णपुरुष का मान और उसकी रचना .. ८६ उत्तरंग के देव . ७१ कलश की उत्पत्ति और स्थापना .. ८७ कलश का उदयमान .. ८८ चौथा अध्याय कलश का विस्तारमान . . ८८ ध्वजादंड रखने का स्थान .. ८६ द्वारमान से मूर्ति और पवासन का मान . ७२ ध्वजाधार (स्तम्भवेध) का स्थान .... ८६ गर्भगृह का मान . ७३ ध्वजाधार की मोटाई और स्तंभिका .. ८६ गर्भगृह के मान से मूर्ति का मान . ७३ ध्वजाधार, ध्वजदड और ध्वजा का चित्र .. ६० देवो का दृष्टि स्थान . ७३ ध्वजादड का उदयमान .... ६० देवो का पद स्थान . ७४ ध्वजादंड का दूसरा उदयमान .. ६१ प्रहार थर . ७५ ध्वजादंड का तीसरा उदयमान .... ६१ छाद्य ( छजा ) के थर मान ७५ ध्वजादंड का विस्तारमान . . ६१ शृङ्ग क्रम .. ७५ ध्वजादंड की रचना .... ६२ उरु शृङ्ग का क्रम सचित्र ७६ विषमपर्व वाले ध्वजादड के तेरह नाम ... ६२ शिखर निर्माण . ७६ ध्वजादंड की पाटली .... ६२ २५६ रेखा की साधना सचित्र .. ७७ ध्वजा का मान ... ६३ उदय भेदोद्भव रेखा . . ७८ ध्वजा का महात्म्य ... ६३ कलाभेदोद्भव रेखा . ७८ रेखाचक्र .. ७६ पांचवां अध्याय त्रिखंडा कला रेखा .. ७६ सोलह प्रकार के चार ७६ ग्रंथ मान्यता की याचना ... ६५ त्रिखंडा की रेखा और कला . ८० वैराज्यप्रासाद ... ६५ रेखा सत्या . ८१ फालना के भेद ... ६५ मडोवर और शिखर का उदयमान ८१ भ्रमणी ( परिक्रमा ) ... ६६ शिखर विधान . ८१ १ वैराज्य प्रासाद ... ६६ ग्रीवा, आमलसार और कलश का मान . ८२ वैराज्यादि जातिका प्रासाद चित्र शुकनास का उदय . ८२ नागर जातिका कलामय मंडोवर चित्र सिंह स्थान . ८२ दिशा के द्वारका नियम ... ६७ कपिली ( कोली ) का स्थान .. ८३ २ नन्दन प्रासाद ... ६८ कपिली का मान . ८३ ३ सिंह प्रासाद ... ६६ छह प्रकार की कपिली .. ८३ ४ श्रीनन्दन, ५ मदिर और ६ मलयप्रासाद ६६ प्रासाद के अंडक और आभूषण ८४ ७ विमान, ८ विशाल, ६ त्रैलोक्य भूषण प्रासाद १०० शिखर के नमन का विभाग ८४ १० माहेन्द्र प्रासाद, ११ रत्नशीर्ष आमलसार का मान सचित्र . ८४ १२ सितशृंग प्रासाद ... १०१ आमलसार के नीचे शिखर के कोणरूप ८५ १३ भूधर, १४ भुवन मडन, १५ त्रैलोक्य विजय, सुवर्णपुरुष ( प्रासादपुरुष ) की स्थापना . . ८६ १६ क्षिति वल्लभ, १७ महीधर प्रासाद .. १०२
३१ विषय पृष्ठ विषय पृष्ठ १८ कैलास प्रासाद ... १०३ जिनप्रासाद के मण्डप ११७ १९ नवमंगल, २० गंधमादन, २१ सर्वांगसुन्दर, मडप के पाच मान . ११८ २२ विजयानन्द प्रासाद १०३ प्रासाद और मंडपका तलदर्शन . ११८ २३ सर्वा गतिक, २४ महा भोग, २५ मेरु प्रासाद प्रासाद और मंडपोका उदय चित्र और प्रासाद प्रदक्षिणा का फल १०४ प्रासाद के मानसे मडप का नाप ... ११९ घूमट का घटा कलश और शुकनासका मान. .. ११९ छठा अध्याय मडप के समविषमतल .... ११९ केसरी आदि, २५ प्रासादो का नाम . १०६ मुख मण्डप .. १२० पचीस प्रासादो की शृंगसंख्या . १०६ स्तभका विस्तार मान . १२१ अष्टविभागीय तलमान १०७ आकृति से स्तभसज्ञा . १२१ दश और बारह विभागीय तलमान १०७ प्राग्रीव मण्डप १२२ चौदह और सोलह विभागीय तलमान १०७ आठ जाति के गूढ मण्डप " १२२ अठारह, बीस और बाईस विभागीय सर्वांगपूर्ण सागोपाग वाला प्राचीन देवालयका चित्र तलमान .. १०८ आमेर के जगतशरणजी के मन्दिर का चित्र तलो के क्रम से प्रासाद सख्या .... १०८ प्राचीन स्तभोका रेखा चित्र .... १२३ निरधार प्रासाद . ११० आठ गूढ मडपो का रेखा चित्र ... १२४ प्रासाद तलाकृति ... ११० आबू मन्दिर के मण्डप, स्तभ और तोरण का चित्र लम्ब चौरस प्रासाद १११ गूढमडप की फालना १२५ गोल, लबगोल और अष्टास्रप्रासाद ... १११ घूमट के उदय का तीन प्रकार .. १२५ नागरप्रासाद .. १११ घूमटका न्यूनाधिक उदय फल १२६ द्राविड प्रासाद ... ११२ बारह चौकी मडप १२६ भूमिज प्रासाद .. ११२ बारह चौकी मडप का रेखा चित्र . १२७ लतिन, श्रीवत्स और नागरप्रासाद ११२ सप्तविंशति मडपका रेखा चित्र . . १२८ मेरु प्रासाद ११२ नृत्यमडप .... १२९ द्राविडजातिका गोपुर प्रासाद चित्र सप्तविंशति मण्डप .. १३० विमान नागर प्रासाद ... ११३ अष्टास्र और षोडशाल का मान १३० १ श्रीमेरु २ हेमशीर्षमेरु, ३ सुरवल्लभ क्षिप्त वितान का चित्र मेरु प्रासाद .... ११३ उत्क्षिप्त वितान का चित्र ४ भुवनमण्डन, ५ रत्नशीर्ष, ६ किरणोद्भव वितान का प्रकार १३१ ७ कमल हंस मेरुप्रासाद .. ११४ वितान के थर ... १३१ ८ स्वर्णकेतु और ९ वृषभध्वज मेरुप्रासाद .. ११५ वितान संख्या १३२ समतल-वितान मे नृसिंहावतार का चित्र सातवां अध्याय वर्ण और जाति के चार प्रकार के वितान १३३ मडपविधान ११७ रगभूमि . १३४ गर्भाश्रमण्डप ११७ बलाराक का स्थान १३४
३२ विषय पृष्ठ विषय पृष्ठ बलाएक का मान . .. १३४ छाया भेद .... १५० प्रसाद के मान से बलाएक का मान .... १३४ देवपुर, राजमहल और नगर का मान .... १५० उत्तरग का पेटा भाग .. १३५ राजनगर मे देव स्थान ....' १५० पाच प्रकार के बलाएक ... १३५ आश्रम और मठ .... १५१ सवरणा .. १३६ स्थान विभाग .... १५१ प्रथम सवरणा का रेखा चित्र .. १३७ प्रतिष्ठा मुहूर्त .... १५१ दूसरी संवरणा का चित्र .... १३८ प्रतिष्ठा के नक्षत्र .... १५२ पचीस सवरणा के नाम . १३६ प्रतिष्ठा मे वर्जनीय तिथि .... १५२ प्रथम पुष्पिका संवरणा . १३६ प्रतिष्ठा मण्डप .... १५२ १८ वी शताब्दी से आधुनिक समय की यज्ञ कुण्ड का मान .... १५३ सवरणा का रेखा चित्र .. १४० आहुति सख्या से कुण्ड मान .. १५३ जैसलमेर जैन मन्दिर की संवरणाचित्र दिशानुसार कुण्डो की आकृति .... १५३ कीर्ति स्तभ का चित्र मण्डल .... १५४ दूसरी नन्दिनी संवरणा . १४१ ऋत्विजसंख्या .... १५५ प्राचीन संवरणा का चित्र .... १४२ देवस्नान विधि ... १५५ आठ वां अध्याय देवशयन .... १५५ रत्नन्यास .... १५६ शिवलिंग का न्यूनाधिक मान ... १४३ धातुन्यास .... १५६ वास्तुदोष ... १४३ औषधिन्यास .... १५६ निषेधवास्तु द्रव्य . : १४३ धान्यन्यास .... १५७ शिवालय उत्थापन दोष .... १४४ आचार्य और शिल्पियो का सन्मान .... १५७ जीर्णोद्धार का पुण्य ... १४४ प्रासाद के अंगो मे देव न्यास .... १५८ जीर्णोद्धार का वास्तु स्वरूप . १४४ प्रतिष्ठत देव का प्रथम दर्शन .. १५६ दिट् मूढ दोष . : १४४ सूत्रधार पूजन .... ५६० दिङ् मूढ का परिहार ... १४५ देवालय निर्माण का फल .... १६० अव्यक्त प्रासाद का चालन . : १४५ सूत्रधार का आशीर्वाद .... १६० महापुरुष स्थापित देव १४५ आचार्य पूजन . १६० जीर्णवास्तु पातन विधि .... १४६ जिनदेवप्रतिष्ठा .. १६१ महादोष ... १४६ जलाशय प्रतिष्ठा .. १६२ शिष्टेष्ट महा दोष . १४६ जलाशय बनाने का पुण्य .... १६२ भिन्न और अभिन्न दोष १४७ वास्तु पुरुषोत्पत्ति .. १६२ दोषो के भिन्नदोष . १४७ वास्तुपुरुष के ४५ देव . १६४ व्यक्ताव्यक्त प्रासाद . १४८ वास्तुमंडल के कोने की आठ देवी .. १६६ मग्रमर्म दोष १४८ शास्त्र प्रशंसा .. १६६ अन्य दोषो का फल ... १४६ अन्तिममंगल . १६७
८ अमृतोद्भव प्रासाद . १७३ १२ पृथ्विजय प्रासाद ... १७५ (in image: पृथ्विजय, not पृथ्वीजय) १९ वज्रक प्रासाद .... १७९ २३ पक्षिराज (गरुड) प्रासाद .. १८१ (in image: गरुड, with ड) मेरुप्रासाद की प्रदक्षिणा का फल . १८३ ९ पुष्टि वर्द्धन प्रासाद . १९० (in image: पुष्टि वर्द्ध न) ११ श्रीवल्लभप्रासाद १९१ १२ चन्द्रप्रभजिन प्रासाद " १९१ (in image: double quotes/ditto mark '"') १५ पुष्पदतजिन प्रासाद १९३ (in image: पुष्पदतजिन) १९ श्रे यासजिनवल्लभ प्रासाद . १९५ (in image: श्रे यास...) ३३ कु थुनाथ जिनवल्लभ प्रासाद .. २०१ (in image: कु थुनाथ...)
Everything is verified and ready.३३ परिशिष्ट नं० १ विषय पृष्ठ केसरी आदि २५ प्रसादो का नाम .... १६८ १ केसरी प्रासाद ... १६९ २ सर्वतोभद्र प्रासाद .... १७० [
३८ ⋯ पृष्ठ विषय पृष्ठ ⋯ २०३ ५२ सुतुङ्ग प्रासाद .. २०८ ⋯ २०४ ५३ पार्श्वनाथ जिन वल्लभ प्रासाद .... २०८ ⋯ २०४ ५४ पद्मावती प्रासाद ... २०९ ⋯ २०४ ५५ रूप वल्लभ प्रासाद ... २०९ ⋯ २०४ ५६ महावीर जिन प्रासाद .... २१० ⋯ २०५ ५७ अष्टापद प्रासाद .... २१० ⋯ २०५ ५८ तुष्टि पुष्टि प्रासाद .... २११ ⋯ २०६ जिन प्रासाद प्रशंसा .. २११ ⋯ २०६ शब्दों का अकारादिक्रम .... २१३ ⋯ २०७ शुद्धि पत्रक ... २२६ ⋯ २०७ अनुवाद के सहायक ग्रन्थ ... २२८ ⋯ २०८ ———
लताश्रृंगवाला विमान नागर जाति का प्रासाद (पीठ मडोवर और शिखर का सर्वाङ्गपूर्ण दृश्य) - उदयपुर-मेवाड़
प्राग्ग्रीव मंडप वाला नागर जाति का निरधार प्रासाद खजुराहो (मध्यप्रदेश)
ॐ णमो जिणाणं मण्डनसूत्रधारविरचितम् प्रासादमण्डनम् टीकाकारका मंगलाचरण— "परं परमेष्ठिनं जिनं नत्वा करोम्यहम् । प्रासादमण्डनप्रबो-धाय भाषां सुबोधिनीम् ॥" श्रेष्ठ जो पञ्च परमेष्ठी जिनदेव है, उनको नमस्कार करके प्रासाद मंडन नाम के शिल्प- शास्त्र को अच्छी तरह समझने के लिये सुबोधिनी नामकी टीका करता हूं । ग्रन्थकार का मंगलाचरण— गणेशाय नमस्तस्मै निर्विघ्नसिद्धिहेतवे । आदिगौरीसमुद्भूत-तेजसा सम्भूताय¹ वै ॥१॥ निर्विघ्न रूप से अपने कार्य की सिद्धि के लिए महामाया पार्वतीदेवी के अद्भुत तेज से उत्पन्न हुए श्री गणेश देव को नमस्कार है ॥१॥ महामायेति या गीता चिन्मयी मुनिसत्तमैः । तनोतु² वाग्विलासं मे जिह्वायां सा सरस्वती ॥२॥ महान् ऋषियों ने जिनकी स्तुति की है, ऐसी ज्ञानमयी महामाया सरस्वती देवी मेरी जिह्वा मे निवास करके वाणी का विस्तार करें ॥२॥ सृष्ट्याद्यसूत्रधारस्य प्रसादाद् विश्वकर्मणः । प्रासादमण्डनं ब्रूते सूत्रधारेषु मण्डनः ॥३॥ सृष्टि के आद्य सूत्रधार श्री विश्वकर्मा की कृपा से सूत्रधारो मे श्रेष्ठ भूषण रूप 'मण्डन' नाम का सूत्रधार प्रासादमण्डन नामका यह ग्रन्थ कहता है ॥२॥ गृहेषु यो विधिः प्रोक्तो त्रिनिवेशप्रवेशने । स एव विधिना³ कार्यो देवतायतनेष्वपि ॥४॥ (१) सम्भवाय (२) करोतु (३) विदुषा
२ प्रासादमण्डने घर बनाने की तथा उसमे प्रवेश करने की जो विधि वास्तुशास्त्र में विद्वानों ने बतलायी है, उस विधि के अनुसार देवालय मे भी कार्य करे ॥४॥ देवपूजित शिवस्थान— हिमाद्रेरुत्तरे पार्श्वे चारुदारुवनं परम् । पावनं शङ्करस्थानं तत्र सर्वैः शिवोऽर्चितः ॥५॥ हिमालय पर्वत के उत्तर दिशा में एक बडा मनोहर देवदारु वृक्षों का सुन्दर वन है, यह महादेवजी का पवित्र तीर्थस्थान है। वहां सब देव और दैत्य आदि ने मिलकर महादेव की पूजा की ॥५॥ प्रासादों की जाति— प्रासादाकारपूजाभिर्देवदैत्यादिभिः क्रमात् । चतुर्दश समुत्पन्नाः प्रासादानां सुजातयः² ॥६॥ देव और दैत्य आदि सब देवो ने अनुक्रम से प्रासाद के आकार वाली शंकर की अनेक प्रकार से पूजा की, जिसके चौदह लोक के देवों द्वारा भिन्न भिन्न रूप से पूजित होने से चौदह प्रकार की प्रासाद की जाति उत्पन्न हुई ॥६॥ प्रासादोत्पत्ति की चौदह जाति— “यत्र येषां कृता पूजा तत्र तन्नामकास्तु ते । प्रासादानां समस्तानां कथयिष्याम्यनुक्रमम् ॥ सुरैस्तु नागराः ख्याता द्राविडा दानवेन्द्रकैः । लतिनाश्चैव गन्धर्वै-र्यक्षैश्चापि विमानजाः ॥ विद्याधरैर्मिश्रकाश्च वसुभिश्च वराटकाः । सान्धाराश्चोरगैः ख्याताः नरेन्द्रै¹र्भूमिजास्तथा ॥ विमाननागरच्छन्दाः सूर्यलोकसमुद्भवाः । नक्षत्राधिपलोकोक्ताश्छन्दा विमानपुष्पकाः ॥ पार्वतीसम्भवाः सेना वलभ्याकारसंस्थिताः । हरसिद्ध्यादिदेवीभिः कार्याः सिंहावलोकनाः ॥ व्यन्तरस्थितदेवैस्तु फासनाकारिणो मताः । इन्द्रलोकसमुद्भूता रथाश्च विविधा मताः ॥” अपराजितपृच्छा सू० १०६ (१) देवगुरु (२) 'च'
प्रथमोऽध्यायः ३
'जिन जिन देवो ने प्रासाद के आकार वाली पूजा की, उनके नाम वाले, जो जो प्रासाद उत्पन्न हुए, उनको अनुक्रम से कहूँगा (१) देवो के पूजन से नागर जाति, (२) दानवो के पूजन से द्राविडजाति, (३) गन्धर्वो के पूजन से लतिनजाति, (४) यक्षों के पूजन से विमानजाति, (५) विद्याधरों के पूजन से मिश्रजाति, (६) वसु देवो के पूजन से वराटकजाति, (७) नागदेवो के पूजन से सान्धार जाति, (८,) नरेन्द्रो के पूजन से भूमिजजाति, (६) सूर्यदेवो के पूजन से विमान- नागर जाति, (१०) चन्द्रमा के पूजन से विमानपुष्पक जाति, (११) पार्वती के पूजन से वलभी जाति, (१२) हरसिद्धि आदि देवियों के पूजन से सिंहावलोकन जाति, (१३) व्यन्तर स्थित देवों के पूजन से फांसी के आकार वाली जाति, १४-और इन्द्रलोक के देवो के पूजन से रथारूढ़ (दारुजादि) जाति, ये चौदह जाति के प्रासाद उत्पन्न हुए। आठ जाति के उत्तम प्रासाद— नागरा द्राविडाश्चैव भूमिजा लतिनास्तथा । सावन्धारा विमानादि-नागराः पुष्पकाङ्किताः' ॥७॥ मिश्रकास्तिलकैः २ शृङ्गैरुत्तै जातिषु चोत्तमाः । सर्वदेवेषु कर्त्तव्याः शिवस्यापि विशेषतः ॥८॥ चौदह जाति के प्रासादों मे (१) नागर, (२) द्राविड, (३) भूमिज, (४) लतिन, (५) सावं- धार (सांधार केसरी आदि), (६) विमान नागर, (७) विमान पुष्पक, और (८) शृङ्ग और तिलक वाला मिश्र, ये आठ जाति के प्रासाद उत्तम हैं। इसलिये सब देवो के लिये यही बनाने चाहिये, उनमे भी विशेषकर महादेवजी के लिये बनाना श्रेयस्कर है ॥७-८॥ प्रासादानां च सर्वेषां जातयो देशभेदतः । चतुर्दश प्रवर्त्तन्ते ज्ञेया लोकानुसारतः ॥६॥ सब प्रासादो के भेद देशो के भेद के अनुसार होते है। इनके मुख्य चौदह भेद है, वे अन्य अपराजित पृच्छा सूत्र ११२ आदि शास्त्रो से जानना चाहिये ॥६॥ लक्ष्यलक्षणतोऽभ्यासाद् गुरुमार्गानुसारतः । प्रासादभवनादीनां सर्वज्ञानमवाप्यते ॥१०॥ प्रासाद और गृह आदि बनाने के लिये सब प्रकार का शिल्पज्ञान, उसके लक्ष्य और लक्षण के अभ्यास से एवं गुरुशिक्षा के अनुसार प्राप्त करना चाहिये ॥१०॥
(१) पुष्पकान्विता (२) प्रासादमिश्रकारश्चैव
४ प्रासादमण्डने प्रासाद का निर्माण समय— शुभलग्ने सुनक्षत्रे¹ पञ्चग्रहबलान्विते । माससंक्रान्तिवत्सादि-निषिधकालवर्जिते ॥११॥ शुभ लग्न और शुभ नक्षत्र मे, पांच ग्रह ( सूर्य, चन्द्र, बुध, गुरु और शुक्र ) के बलवान् होने पर, तथा मास, संक्रान्ति और दत्त आदि के निषेध समय को छोड़ कर प्रासाद बनाना आरंभ करे ॥११॥ भूमि परीक्षा— सर्वदिक्षु प्रवाहो वा प्रागुदक्शङ्करप्लवम् । भूमि परीक्ष्य संसिञ्चेत् पञ्चगव्येन कोविदः ॥१२॥ मणिसुवर्णरूप्येण विद्रुमेण फलेन वा । प्रथम प्रासाद, बनाने की भूमि की परीक्षा करनी चाहिये । जिस भूमि पर चारों दिशाओं मे पानी का प्रवाह चलता हो अर्थात वह चारों दिशाओं मे नीची हो और बीच मे ऊंची हो, अथवा पूर्व, उत्तर और ईशान कोनों मे नीची हो, अर्थात् इन तीन दिशाओं मे पानी का प्रवाह जाता हो तो ऐसी भूमि शुभदायक है । विशेष जानने के लिये देखें अपराजित पृच्छा सूत्र० ५१. इस प्रकार भूमिकी परीक्षा करके विद्वान् जन पञ्च गव्य ( गाय का दूध, दही, घी, मूत्र और गोबर ) से उस भूमि पर छिड़काव करें तथा मणि, सोना, रूपा, मूंगा और फलो से भूमि को पवित्र करे ॥१२॥ वास्तुमंडल लिखने का पदार्थ— चतुःषष्टिपदैर्वास्तुं लिखेद्वापि शतांशकैः ॥१३॥ पिष्टेन वाक्षतैः शुद्धैस्ततो² वास्तुं समर्च्चयेत् । पूर्वोक्तेन विधानेन बलिपुष्पैश्च³ पूजयेत् ॥१४॥ प्रासाद के आरभ होने से समाप्त होने तक उतने समय मे सात अथवा चौदह बार चौसठ पद का अथवा एकसौ पद का वास्तुमण्डल* पूजा जाता है । यह शुद्ध आटा अथवा शुद्ध चावलो मे बनाना चाहिये । पश्चात् उसे पूर्वाचार्यो द्वारा बतलाई गई विधि के अनुसार बलि और पुष्प आदि से पूजना चाहिये ॥१३॥१४॥ (१) शुभर्चे च (२) ऊर्ध्वं (३) बलिपुष्पादिपूजनैः
- विशेष जानने के लिये देखें स्वयंद्वारा अनुदित राजवल्लभमंडन में दूसरा अध्याय ।
प्रथमोऽध्यायः ५ आठ दिक्पाल— इन्द्रो वह्निः पितृपतिर्नैर्ऋतो वरुणो मरुत् । कुवेर ईशः पतयः पूर्वांदीनां दिशां क्रमात् ॥१५॥ इन्द्र, अग्नि, यम, नैर्ऋति, वरुण, वायु, कुबेर और ईश, ये आठ देव अनुक्रम से पूर्वादि दिशाओ के अधिपति है ॥१५॥ कार्यारम्भ के समय पूजनीय देव— दिक्पालाः क्षेत्रपालाश्च गणेशश्चण्डिका तथा । एतेषां विधिवत् पूजां कृत्वा कर्म समारभेत्¹ ॥१६॥ दिक्पाल, क्षेत्रपाल, गणेश और चण्डिका देवी आदि देव देवियो की विधि पूर्वक पूजा करके कार्य आरंभ करे ॥१६॥ निषेध समय— धनुर्मीनस्थिते सूर्ये गुरौ शुक्रेऽस्तगे विधौ । वैधृतौ व्यतिपाते च दग्धायां न कदाचन ॥१७॥ धन और मीन संक्रांति का सूर्य हो, गुरु शुक्र और चन्द्रमा ये अस्त हो, वैधृति और व्यतिपात के योग हो, तथा दग्धा तिथि हो, तब कभी भी नवीन कार्य का आरंभ नही करना चाहिये ॥१७॥ वत्समुख— कन्यादित्रित्रिभे² सूर्ये द्वारं पूर्वादिषु त्यजेत् । सृष्ट्या वत्समुखं तत्र स्वामिनो हानिकृद्यतः ॥१८॥ कन्या आदि तीन तीन राशि पर सूर्य हो, तब अनुक्रम से पूर्व आदि दिशाओ में द्वार आदि का कार्य नही करना चाहिये । क्योकि उन दिशाओ में सृष्टिक्रम से अर्थात् पूर्व, दक्षिण पश्चिम और उत्तर दिशा मे वत्सका मुख रहता है। यह कार्य कराने वाले स्वामी को हानिकारक है । जैसे-कन्या, तुला और वृश्चिक राशि पर सूर्य हो तब वत्स का मुख पूर्व दिशा मे, धन, मकर और कुंभ राशि का सूर्य हो तब वत्स का मुख दक्षिण दिशा में, मीन मेष और वृष राशि का सूर्य हो तब वत्स का मुख पश्चिम दिशा मे; मिथुन, कर्क और सिंह राशि का सूर्य हो तब वत्स का मुख उत्तर दिशा मे रहता है । ॥१८॥ (१) समाचरेत् (२) त्रित्रिगे