भारतकोश
प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

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४ प्रासादमण्डने प्रासाद का निर्माण समय— शुभलग्ने सुनक्षत्रे¹ पञ्चग्रहबलान्विते । माससंक्रान्तिवत्सादि-निषिधकालवर्जिते ॥११॥ शुभ लग्न और शुभ नक्षत्र मे, पांच ग्रह ( सूर्य, चन्द्र, बुध, गुरु और शुक्र ) के बलवान् होने पर, तथा मास, संक्रान्ति और दत्त आदि के निषेध समय को छोड़ कर प्रासाद बनाना आरंभ करे ॥११॥ भूमि परीक्षा— सर्वदिक्षु प्रवाहो वा प्रागुदक्शङ्करप्लवम् । भूमि परीक्ष्य संसिञ्चेत् पञ्चगव्येन कोविदः ॥१२॥ मणिसुवर्णरूप्येण विद्रुमेण फलेन वा । प्रथम प्रासाद, बनाने की भूमि की परीक्षा करनी चाहिये । जिस भूमि पर चारों दिशाओं मे पानी का प्रवाह चलता हो अर्थात वह चारों दिशाओं मे नीची हो और बीच मे ऊंची हो, अथवा पूर्व, उत्तर और ईशान कोनों मे नीची हो, अर्थात् इन तीन दिशाओं मे पानी का प्रवाह जाता हो तो ऐसी भूमि शुभदायक है । विशेष जानने के लिये देखें अपराजित पृच्छा सूत्र० ५१. इस प्रकार भूमिकी परीक्षा करके विद्वान् जन पञ्च गव्य ( गाय का दूध, दही, घी, मूत्र और गोबर ) से उस भूमि पर छिड़काव करें तथा मणि, सोना, रूपा, मूंगा और फलो से भूमि को पवित्र करे ॥१२॥ वास्तुमंडल लिखने का पदार्थ— चतुःषष्टिपदैर्वास्तुं लिखेद्वापि शतांशकैः ॥१३॥ पिष्टेन वाक्षतैः शुद्धैस्ततो² वास्तुं समर्च्चयेत् । पूर्वोक्तेन विधानेन बलिपुष्पैश्च³ पूजयेत् ॥१४॥ प्रासाद के आरभ होने से समाप्त होने तक उतने समय मे सात अथवा चौदह बार चौसठ पद का अथवा एकसौ पद का वास्तुमण्डल* पूजा जाता है । यह शुद्ध आटा अथवा शुद्ध चावलो मे बनाना चाहिये । पश्चात् उसे पूर्वाचार्यो द्वारा बतलाई गई विधि के अनुसार बलि और पुष्प आदि से पूजना चाहिये ॥१३॥१४॥ (१) शुभर्चे च (२) ऊर्ध्वं (३) बलिपुष्पादिपूजनैः

  • विशेष जानने के लिये देखें स्वयंद्वारा अनुदित राजवल्लभमंडन में दूसरा अध्याय ।
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