प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
पृष्ठ 42, कुल 278 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रथमोऽध्यायः ५ आठ दिक्पाल— इन्द्रो वह्निः पितृपतिर्नैर्ऋतो वरुणो मरुत् । कुवेर ईशः पतयः पूर्वांदीनां दिशां क्रमात् ॥१५॥ इन्द्र, अग्नि, यम, नैर्ऋति, वरुण, वायु, कुबेर और ईश, ये आठ देव अनुक्रम से पूर्वादि दिशाओ के अधिपति है ॥१५॥ कार्यारम्भ के समय पूजनीय देव— दिक्पालाः क्षेत्रपालाश्च गणेशश्चण्डिका तथा । एतेषां विधिवत् पूजां कृत्वा कर्म समारभेत्¹ ॥१६॥ दिक्पाल, क्षेत्रपाल, गणेश और चण्डिका देवी आदि देव देवियो की विधि पूर्वक पूजा करके कार्य आरंभ करे ॥१६॥ निषेध समय— धनुर्मीनस्थिते सूर्ये गुरौ शुक्रेऽस्तगे विधौ । वैधृतौ व्यतिपाते च दग्धायां न कदाचन ॥१७॥ धन और मीन संक्रांति का सूर्य हो, गुरु शुक्र और चन्द्रमा ये अस्त हो, वैधृति और व्यतिपात के योग हो, तथा दग्धा तिथि हो, तब कभी भी नवीन कार्य का आरंभ नही करना चाहिये ॥१७॥ वत्समुख— कन्यादित्रित्रिभे² सूर्ये द्वारं पूर्वादिषु त्यजेत् । सृष्ट्या वत्समुखं तत्र स्वामिनो हानिकृद्यतः ॥१८॥ कन्या आदि तीन तीन राशि पर सूर्य हो, तब अनुक्रम से पूर्व आदि दिशाओ में द्वार आदि का कार्य नही करना चाहिये । क्योकि उन दिशाओ में सृष्टिक्रम से अर्थात् पूर्व, दक्षिण पश्चिम और उत्तर दिशा मे वत्सका मुख रहता है। यह कार्य कराने वाले स्वामी को हानिकारक है । जैसे-कन्या, तुला और वृश्चिक राशि पर सूर्य हो तब वत्स का मुख पूर्व दिशा मे, धन, मकर और कुंभ राशि का सूर्य हो तब वत्स का मुख दक्षिण दिशा में, मीन मेष और वृष राशि का सूर्य हो तब वत्स का मुख पश्चिम दिशा मे; मिथुन, कर्क और सिंह राशि का सूर्य हो तब वत्स का मुख उत्तर दिशा मे रहता है । ॥१८॥ (१) समाचरेत् (२) त्रित्रिगे