प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६ प्रासादमण्डने जिस दिशा में वत्स का मुख हो, उस दिशा में तथा मुख के सामने वाली दिशा में खात, देव प्रतिष्ठा, द्वार प्रतिष्ठा आदि कार्य करना शास्त्र मे वर्जित है, परन्तु वत्समुख एक दिशा में तीन तीन मास तक रहता है। इसलिये तीन मास तक उक्त कार्य को नही रोकने के लिये ठक्कुर फेरु कृत 'वत्थुसार पयरण' प्र० १ गाथा २० में विशेष रूप से बतलाया है कि— “गिहभूमि सत्तभाए पण दह तिहि तीस तिहि दहक्क कमा इम्र दिणसंखा चउदिसि सिरपुच्छसमकि वच्छठिई ॥” घर या प्रासाद की भूमि का प्रत्येक दिशा में सात सात भाग करना, उनमे अनुक्रम से प्रथम भाग में पांच दिन, दूसरे में दस दिन, तीसरे में पंद्रह दिन, चौथे में तीस दिन, पांचवें मे पंद्रह दिन, छठे में दस दिन और सातवे भाग में पांच दिन वत्स का मुख रहता है। इस प्रकार भूमि की चारो दिशाओं मे दिन संख्या समझना चाहिये। जिस अंक पर वत्स का मुख हो, उसी अंक के सामने वाले बराबर के अंक पर वत्स की पूंछ रहती है। इस प्रकार की वत्स की स्थिति है। [चक्र: उत्तर— वायव्य