प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमोऽध्यायः ७ वत्सके सिर के भाग में और उनके सामने के भाग मे देव मंदिर अथवा मनुष्य के घर नही बनावे, यदि बनावेगे तो मृत्यु, रोग और भय हमेशा बना रहेगा। इसलिये वत्स की कुक्षि में कार्य करना अच्छा है। विशेष उक्त ग्रंथ मे देखें । आयादिका विचार— आयो व्ययर्द्ध्मंशस्य भित्तिवाह्ये सुरालये । ध्वजायो देवनक्षत्रं व्ययांशौ प्रथमौ शुभौ ॥१६॥ आय, व्यय, नक्षत्र और अंश आदि की गणना देवालय मे दीवार के बाहर के भाग से होती है। देवालय मे ध्वज आय, देव नक्षत्र, प्रथम व्यय और प्रथम अंश ये शुभ है ॥१६॥ केषाञ्चिन्मरुतां¹ गेहे वृषसिंहगजाः शुभाः । आयादूने² व्ययः श्रेष्ठः पिशाचस्तु समोऽधिकः ॥२०॥ देवालयों मे वृष, सिंह और गज आय भी श्रेष्ठ है। अपराजित पृच्छा सूत्र ६४ में भी कहा है कि—'ध्वजः सिंहो वृषगजो शस्यन्ते सुरवेश्मनि ।' आय से व्यय कम हो तो श्रेष्ठ है। सम व्यय हो तो पिशाच और अधिक व्यय हो तो राक्षस नाम का व्यय माना जाता है ॥२०॥ देवालय में विचारणीय— देवतानां गृहे चिन्त्य-मायाद्यङ्गचतुष्टयम् । नवाङ्गं नादीवेधादि-स्थापकामरयोर्मिथः ॥२१॥ देवालय मे आय, व्यय, अंश और नक्षत्र इन चार अंगों का, तथा स्थापक (देव स्थापन करने वाले ) और देव इन दोनो के परस्पर नाडीवैध, योनि, गण, राशि, वर्ण, वश्य, तारा, वर्ग और राशिपति, इन नव अङ्गों का विचार करना चाहिये ॥२१॥ आयादिचिन्तनं भूमि-लक्षणं वास्तुमण्डलम् । मासनक्षत्रलग्नादि-चिन्तनं पूर्वशास्त्रतः ॥२२॥ आय आदिका विचार, भूमिका लक्षण, वास्तु मण्डल, मास, नक्षत्र और लग्न आदिका विचार, ये सब राजवल्लभ मंडन और अपराजित पृच्छा आदि शास्त्रो से जानना चाहिये ॥२२॥ आय व्यय और नक्षत्र लाने का प्रकार— “व्यासे दैर्घ्यगुणेऽष्टभिर्विभजिते शेषो ध्वजाद्यायको, ऽष्टघ्ने तद्गुणिते च धिष्ण्यभजिते साहक्षमश्वादिकम् । (१) केपा च (२) हीन आय.द