भारतकोश
प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

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२६ रखना चाहिये । इस अनुपात से शिखर सुहावना प्रतीत होता है । गर्भ गृह की मूलरेखा या चौड़ाइ से शिखर का उदय सवाया रक्खा जाता है । शिखर के वलण अर्थात् नमन की युक्ति साधने के लिए उसके उदय भाग मे और स्कन्ध मे क्रमश: रेखाओ और कलाओ की सूक्ष्म गणना स्थपति सम्प्रदाय मे प्रचलित है । उस विषय का संक्षिप्त संकेत मंडन ने किया है । रेखाओ और कलाओ का यह विषय अपराजित पृच्छा (प्र. १३६-१४१) मे भी आया है । खेद है कि यह विषय अभी तक स्पष्ट न होने से इस पर अधिक प्रकाश डालना सम्भव नही । मडन का कथन है कि खरशिला से कलश तक बीस भाग करके आठ या ८½ या ६ भाग मे मंडोवर की ऊचाई और शेष मे शिखर का उदय रक्खा जाता है । शिखर के गूमट नुमा उठान को पद्मकोश कहा जाता है (४।२३) पद्मकोश की आकृति लाने के लिये मडन ने अति संक्षिप्त रीति से एक युक्ति कही है (चतुर्गुणेन सूत्रेण सपाद. शिखरोदय: (४।२३) इसके अनुसार शिखर की मूलरेखा मे चौगुना सूत्र लेकर यदि नये प्राप्त दोनो बिन्दुओ को केन्द्र मानकर गोल रेखाये खीची जाय तो जहा वे एक दूसरे को काटती हो वह शिखर का अतिम विन्दु हुआ । शिखर की मूल रेखा से उसकी (मूल रेखा की) सवाई जितनी ऊंचाई पर एक रेखा खीची जाय तो वह शिखर का स्कन्ध स्थान होगा । इस स्कन्ध और पद्मकोश के अंतिम बिन्दु तक की ऊंचाई के सात भाग करके एक भाग मे ग्रीवा, १½ भाग मे आमलक शिला, १½ भाग मे पद्मपत्र (जिन्हे आजकल लीलोफर कहते है), और तीन भाग मे कलश का मान रहेगा । शिखर मे शुकनास का भी महत्त्वपूर्ण स्थान है । शुकनास की ऊंचाई के पाच विकल्प कहे है । अर्थात् छज्जे से स्कन्ध तक के उदय को जब इक्कीस भागो मे बाटा जाय तो ६, १०, ११, १२, १३, अंशो तक कही भी शुकनास का उच्छ्रय किया जा सकता है। शुकनासिका के उदय के पुन: नव भाग करके १, ३, ५, ७, या ६ भागो मे कही पर भी झम्पार्सिंह रखना चाहिये। शुकनासा, प्रासाद या देव मदिर की नासिका के समान है । शिखर मे शुकनासिका का निकलता खाता नीचे के अंतराल मण्डप के अनुसार बनाया जाता है । अंतराल मण्डप को कपिली या कौली मण्डप भी कहते है । (४।२७) अन्तराल मडप की गहराई छ: प्रकार की बताई गई है । शिखर की रचना मे शृ ग, उरुशृंग (छातिया शृ ग), प्रत्यग और अण्डको का महत्त्वपूर्ण स्थान है । एव भिन्न भिन्न प्रकार के शिखरो के लिए उनकी गणना अलग २ की जाती है । इसी प्रकार तवग, तिलक और सिहकर्ण ये भी प्रकारान्तर के अलकरण है जिन्हे प्रासाद के शिखर का भूषण कहा जाता है और इनकी रचना भी शिखर को विभिन्नता प्रदान करती है । मडन के अनुसार प्रासाद के शिखर पर एक हिरण्यमय प्रासाद पुरुष की स्थापना की जाती है । कलश, दण्ड, और ध्वजारोपण के सबध मे भी विवरण पाया जाता है । पाचवें-छठे अध्यायो मे वैराज्य आदि पच्चीस प्रकार के प्रासादो के लक्षण कहे गए हैं । गर्भ गृह - के कोण से कोण तक प्रासाद के विस्तार के ४ से ११२ तक आवश्यकतानुसार भाग किए जा सकते है और उन्ही भागो के अनुसार फालनाओ के अनेक भेद किए जाते हैं । प्रासादो के नाम और जातिया उनके शिखरो के अनुसार कही गई है । वस्तुत: इन भेदो के आधार पर प्रासादो की सहस्रो जातिया कल्पित की जाती हैं । गर्भ गृह,