प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५ गई है । वास्तविक प्रासाद शिखरो के साथ उन्हें मिलाकर अभी तक कोई अध्ययन प्रस्तुत नही किया गया है । बाण ने सातवीं शती में बहुभूमिक शिखरो का उल्लेख किया है । प्रारम्भिक गुप्तकाल में बने हुए साची के छोटे देव मन्दिर में कोई शिखर नही है । देवगढ के दशावतार मंदिर में शिखर के भीतर का ढोला विद्यमान है । यह इस बात का साक्षी है कि उस मंदिर पर भी शिखर की रचना की गई थी । शिखर का आरम्भ किस रूप में और कब हुआ यह विषय अनुसंधान के योग्य है । पंजाब में मिले हुए उदुम्बर जनपद के सिक्को पर उपलब्ध देवप्रासाद के ऊपर त्रिभूमिक शिखर का स्पष्ट अंकन पाया जाता है । इससे यह सिद्ध होता है कि शिखरो का निर्माण गुप्त युग से पहले होने लगा था । ज्ञात होता है कि मंदिर के वास्तु में दोनो प्रकार मान्य थे । एक शिखर युक्त गर्भ गृह या मण्डप या और दूसरे शिखर विहीन चौरसछत वाले सादा मंदिर जैसे साची और मानवा के मुन्दरा आदि स्थानों में मिले है । इस प्रकार के मदिरो के विकास का पूर्वरूप कुषाण कालीन गन्धकुटी में प्राप्त होता है, जिसमे तीन खडे पत्थरों को चौरस पत्थर से पाट कर उसके भीतर बुद्ध या बोधिसत्व की प्रतिमा स्थापित कर दी जाती थी । कालान्तर में तो शिखर मदिरो का अनिवार्य अंग बनगया और उसकी शोभा एव रूप विधान में अत्यधिक ध्यान दिया जाने लगा । मंदिर के गर्भ गृह में खडी हुई या बैठी हुई देव प्रतिमा की उचाई कितनी हो और उसका दृष्टि सूत्र कितना ऊचा रखा जाय इसके विषय में द्वार की ऊंचाई के अनुसार निर्णय किया जाता था । जैसे एक विकल्प यह था कि द्वार की ऊंचाई के आठ या नव भाग करके, एक भाग छोडकर शेष ऊंचाई के तीन भाग करके उनमे में दो के बराबर मूर्ति की ऊंचाई रखनी चाहिए ।
मंदिर में शिखर की रचना अत्यन्त जटिल विषय है । मडोवर के छज्जे के ऊपर दो एक थर और लगाकर नव शिखर का प्रारम्भ करते है । वास्तुसार में इन थरो के नाम वेराडू और पहाडू कहे है (वास्तुसार पृ ११८) किन्तु मडन ने केवल पहार नामक थर का उल्लेख किया है । शिखर के उठते हुए विन्यास में शृगो की रचना सबसे अधिक महत्वपूर्ण है । मटोवर की विभिन्न फालनाओ की ऊंचाई स्कन्ध के बाद जब शिखर में उठती है तो कोण, प्रतिरथ और रथ आदि की सीध में शृग बनाये जाते है । इन्ही शृगो के द्वारा शिखर का ठाठ जटिल और सुन्दर हो जाता है । बीच के शिखर को यदि हम एक ईकाई मानें तो उसकी चारो दिशाओ में चार उरुशृग बनाये जा सकते है । ये शृग भी शिखर की आकृति के होते हैं । यदि मूल शिखर का सामने से दर्शन किया जाय तो वही आकृति शृग की होती है । प्रासाद के शिखर का सम्मुख दर्शन ही शृग है । मूल शिखर और उसके चारो ओर के चार शृग इस प्रकार कुल ५ शृग युक्त रूप प्रासाद का एक सीधा प्रकार हुआ । बीच के शिखर को मूलमजरी और चारो ओर के मूलभूत बडे शृगो को उरुशृग कहते है । इसी के लिए राजस्थानी और गुजराती रथपतियों में छातियाशृग शब्द भी प्रचलित है । वस्तुत. शृग और शिखर पर्यायवाची [L2