भारतकोश
प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

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२७ आदि प्रासादो का निरूपण किया गया है। प्रयोगात्मक दृष्टि से यह विषय अत्यधिक विस्तार को प्राप्त हो गया था । यहा तक कि मेरु-प्रासाद मे ५०१ शृग तक बनाए जाते थे। वृषभध्वज नामक मेरु मे एक-सहस्र एक अण्डक कहे गये है। मेरु प्रासाद बहु व्यय साध्य होने से केवल राजकीय निर्माण का विषय समझा जाता था । ७ वें अध्याय मे, मण्डपो के निर्माण की विधि दी गई है। १० हाथ से ५० हाथ तक की चौडाई के सम या सपाद मण्डप बनाए जाते थे । जैन मन्दिरो मे गूढमण्डप, चौकी मण्डप, नृत्य मण्डप, इन तीनो मण्डपो का होना आवश्यक माना गया है। मण्डप के ऊपर की छत घण्टा कहलाती थी जिसे हिन्दी मे गूमट कहते है। इसके ऊपर के भाग को सवरण और नीचे के भाग को वितान कहते थे । मडप के निर्माण मे स्तम्भो का विशेषतः विधान किया गया है। ४, ८, १२ या २० कोने तक के स्तम्भ अथवा गोल स्तम्भ बनाए जाते थे । स्तम्भो की सख्या के भेद से २७ प्रकार के मण्डप कहे गए है। १२ स्तम्भो से लेकर २-२ की वृद्धि करते हुए ६४ स्तम्भो तक के मण्डपो का उल्लेख है। गूमट की छत के वितान को दर्दरी, रूपकण्ठ, विद्याधर, नर्तकी, गजतालु, कोल आदि अलकरणो से युक्त थरो से सुशोभित किया जाता था, एक से एक विचित्र वितानो के निर्माण मे भारतीय शिल्पाचार्यो ने अपने कौशल का परिचय दिया था । यहा तक कि एक हजार एक सो तेरह प्रकार के वितान कहे गये है। गूमट के ऊपरी भाग या सवरण के सजावट मे घण्टी का अलकरण मुख्य था । न्यूनातिन्यून पाच घटियो से लेकर ४-४ की सख्या बढाते हुए एक सौ एक घंटियो तक की गिनती की जाती थी । आठवे अध्याय मे मदिरो के एव वापी-कूप-तडागादि के जीर्णोद्धार की विधि कही गई है। साथ ही राजपुर आदि नगरो के निर्माण को सौध, जाल-गवाक्ष, कीर्ति स्तम्भ, जलाराम आदि से सुशोभित करने का वर्णन आया है। इसी प्रकार कोष्ठागार, मत्तवारणी, महानस, पुण्यशाला, आयुधशाला, छात्रागार, जल स्थान, विद्या मण्डप, व्याख्यान मण्डप आदि के निर्माण का विधान भी किया गया है । इस प्रकार सूत्रधार मण्डन ने अपने वास्तुसार सबन्धी इस ग्रथ मे सक्षिप्त शैली द्वारा प्रासाद रचना सबन्धि विस्तृत जानकारी भरने का प्रयत्न किया है। इस ग्रथ का पठन-पाठन मे अधिक प्रचार होना उचित है । श्री प भगवानदास जैन ने अनुवाद और चित्रमय व्याख्या के द्वारा इस ग्रथ को सुलभ बनाने का जो प्रयत्न किया है इसके लिए हमे उनका उपकार मानना चाहिए । व्यक्तिगत रीति से हम उनके ओर भी आभारी , है क्योकि आज से कई वर्ष पूर्व जयपुर मे रहकर हमे उनसे इस ग्रथ के साक्षात् अध्ययन का अवसर प्राप्त हुआ था । विदित हुआ है कि इस ग्रन्थ का वे हिन्दी भाषान्तर भी प्रकाशित करना चाहते हैं। आशा है उस सस्करण मे विषय को स्पष्ट करने वाले रेखाचित्रो की संख्या मे और भी वृद्धि सभव होगी । वासुदेवशरण अग्रवाल अध्यक्ष-कला वास्तु विभाग ता० १-१-६२ काशी विश्व विद्यालय