प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३ हुआ है। यदि विशेष रूप से जगती का निर्माण संभव न हो तो भी पत्थर की शिलाओ के तीन थर एक के ऊपर एक रखने चाहिए। इन थरो को भिट्ट कहा जाता है। नीचे का भिट्ट दूसरे की अपेक्षा कुछ मोटा और दूसरा तीसरे मे कुछ मोटा रक्खा जाता है। भिट्ट जितना ऊचा हो उसका चौथाई निर्गम या निकास किया जाता है। भिट्ट या जगती के ऊपर प्रासाद पीठ का निर्माण होता है। प्रासाद-पीठ और जगती का भेद स्पष्ट समझ लेना चाहिए । जगती के ऊपर मध्य मे बनाए जाने वाले गर्भ गृह या मडोवर की कुर्सी की संज्ञा प्रासाद पीठ है। इस पीठ की जितनी ऊंचाई होती है उसी के बराबर गर्भ गृह का फर्श रक्खा जाता है । प्रासाद पीठ के निर्माण के लिए भी गोले गलतो का या विभिन्न थरो का विधान है। जैसे नौ अंश का जाड्यकु भ, सात भाग की करणी, कपोतालि या केवल के साथ सात भाग की ग्रामपट्टी (जिसमें सिंह मुख की आकृति बनी रहती है। और फिर उनके ऊपर बारह भाग का गज थर, दश भाग का अश्व थर और आठ भाग का नर थर बनाया जाता है। प्रत्येक दो थरो के बीच मे थोडा-अतराल देना उचित है और ऊपर नीचे दोनो और पतली कर्णिका भी रक्खी जा सकती है। प्रासाद पीठ के ऊपर गर्भ गृह या मडोवर बनाया जाता है जिसे वास्तविक रूप मे प्रासाद का उदय भाग कहना चाहिए । मण्ड का अर्थ है पीठ या आसन और जो भाग उसके ऊपर बनाया जाता था उसके लिए मण्डोवर यह सज्ञा प्रचलित हुई । मडोवर के उत्सेध या उदय को १४४ भागो मे बाटा जाता है। यह ऊंचाई प्रासाद पीठ के मस्तक से छज्जे तक ली जाती है। इसके भाग ये है—खुरक ५ भाग, कुम्भक २० भाग, कलश ८ भाग, अतराल २॥ भाग, कपोतिका या कपोतालि ८ भाग, मची ६ भाग, जङ्घा ३५ भाग, उरुजघा (उद्गम) १५ भाग है (जिसे गुजराती मे 'डौढिया' भी कहा जाता हैं), भरणी ८ भाग, शिरावटी या शिरापट्ट १० भाग, ऊपर की कपोतालि ८ भाग, अंतराल ढाई भाग और छज्जा १३ भाग । इस प्रकार १४४ भाग मडोवर के उदय मे रखे जाते है। छज्जे का बाहर की ओर निकलता जाता दश भाग होता है । एक विनेप प्रकार का मडोवर मेरु मडोवर कहलाता है, उसमे भरणी के ऊपर से ही ८ भाग की मञ्ची देकर २५ भाग की जघा बनाई जाती है और फिर छज्जे के ऊपर ७ भाग की एक मञ्ची देकर १६ भाग की जघा बनाते है। उसके ऊपर ७ भाग की भरणी, ४ भाग की शिरावटी, ५ भाग का भारपट्ट और फिर १२ भाग का कूट छाद्य या छज्जा । इस प्रकार, मडोवर की रचना मे तीन जघायें और दो छज्जे बनाये जाते थे । प्रत्येक जङ्घा मे भिन्न भिन्न प्रकार को मूर्तिया उत्कीर्ण की जानी है। आमेर के जगत शरणजी के मदिर मे मेरु मडोवर की रचना की गई हैं। एक दूसरे के ऊपर जो थरो का विन्यास है उनमे निर्गम और प्रवेश का अर्थात् बाहर की ओर निकलता जाता और भीतर की ओर दबाव रखने के भी नियम दिए गए हैं, मंडन का कथन है कि यदि प्रासाद निर्माण मे अल्प द्रव्य व्यय करना हो तो तीन जङ्घाओ मे से इच्छानुसार जघा, रूप या मूर्तियो का निर्माण छोडा भी जा सकता है ( ३।२८ )। ईटो से बने मंदिर मे भीत की चौडाई गर्भ गृह की चौडाई का चौथा भाग और पत्थर के मदिर मे पाचवा भाग रखनी चाहिए। गभारा बीच मे चौरस (युगास्र) रखकर उसके दोनो ओर फालनाए देनी चाहिए, जिनका उल्लेख ऊपर किया जा चुका है। मडन ने फालनाओ के लिए भद्र सुभद्र और प्रतिभद्र शब्दो का प्रयोग किया है। उन्ही के लिए उत्कल की शब्दावली मे रथ, अनुरथ, प्रतिरथ, कोणरथ शब्द आते है । मडोवर और उसके सामने बनाये जाने वाले मडपो के खम्मो की ऊंचाई एक दूसरे के साथ मेल मे रखनी आवश्यक है। मंडप के ऊपर की छत या गूमट को करोट कहा गया है। इस करोट की ऊँचाई मडप की