भारतकोश
प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

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पृष्ठ 180

सप्तमोऽध्यायः १३३ अपराजितपृच्छा सूत्र. १८६ मे श्लोक ४ मे वितान के मुख्य तीन प्रकार लिखे है । देखो— "वितानानि विचित्राणि क्षिप्तान्युत्क्षिप्तकानि च । समतलानि ज्ञेयानि उदितानि त्रिधा क्रमात् ॥" क्षिप्त, उत्क्षिप्त और समतल ये तीन प्रकार के वितान कहे हैं । वर्ण और जाति के चार प्रकार के वितान--- "पद्मकं नाभिच्छन्दश्च सभामार्गस्तृतीयकः । मन्दारक इति प्रोक्तो वितानाश्च चतुर्विधाः ॥" अप० सू० १८६ श्लो० ६ पद्मक, नाभिछन्द, सभामार्ग और मन्दारक ये चार प्रकार के वितान हैं। "पद्मको विप्रजातिः स्यात् क्षत्रियो नाभिच्छन्दकः । सभामार्गो भवेद् वैश्यः शुद्रो मन्दारकस्तथा ॥" श्लो० ७ ब्रह्मण जाति का पद्मक, क्षत्रिय जातिका नाभिछन्द, वैश्यजातिका सभामार्ग और शूद्रजातिका मंदारक नामका वितान है । "पद्मकः श्वेतवर्णः स्यात् क्षत्रियो रक्तवर्णकः । सभामार्गो भवेत् पीतो मन्दारः सर्ववर्णकः ॥" श्लो० ८ सफेद वर्ण का पद्मक, लाल वर्ण का नाभिछंद, पीले वर्ण का सभामार्ग और अनेक वर्ण का मंदारक है । फिर अपराजित पृच्छा सूत्र १९० मे भी चार प्रकारके वितान कहे है— "वितानांश्च प्रवक्ष्यामि भेदंस्तच्च चतुर्विधम् । पद्मक नाभिच्छन्दं च सभा मन्दारकं तथा ॥ श्लो० १ शुद्धश्च छन्दसंघाटो भिन्न उद्भिग्न एव च । एतेषा सन्ति ये भेदाः कथये तान् समासतः ॥" श्लो० २ चार प्रकार के वितानो को कहता हू । पद्मक, नाभिच्छद, सभा और मन्दारक इन चार प्रकार के वितान के शुद्ध, संघात, भिन्न और उद्भिग्न ये चार भेद है । उसको संक्षेप से कहता हूँ । "एकत्वे च भवेच्छुद्धः संघातश्च द्विमिश्रणात् । त्रिमिश्राश्च तथा भिन्ना उद्भिग्नाश्चतुरन्विताः ॥" श्लो० ३ एकही प्रकारकी आकृति वाले शुद्ध, दो प्रकार की मिश्र आकृति वाले सघात, तीन प्रकार की आकृति वाले भिन्न और चार प्रकार की आकृति वाले उद्भिग्न नामके वितान है । "पद्मनाभ सभापद्मं सभामन्दारकं तथा । कमलोद्भवमाख्यातं मिश्रकाणां चतुष्टयम् ॥" श्लो० ४

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