भारतकोश
प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

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पृष्ठ 181

१३४ प्रासादमण्डने पद्मनाभ, सभापद्म, सभामन्दारक और कमलोद्भव ये चार मिश्र जाति के वितान हैं । “किन्तु इसमे इसको आकृतियो का वर्णन नहीं लिखा है ।” वितानानि विचित्राणि वस्त्रचित्रादिभेदतः । शिल्पिलोके प्रवर्त्तन्ते तस्मादूह्यानि लोकतः ॥३६॥ जैसे अनेक प्रकार के चित्र आदि से विभिन्न प्रकार के वस्त्र है, वैसे ही शिल्पशास्त्र मे अनेक प्रकार के वितान है । वे अन्य शास्त्रों से विचार करके बनावे ॥३६॥ रंगभूमि-- मण्डपेषु च सर्वेषु पीठान्ते रङ्गभूमिका । कुर्यादुत्तानपट्टेन चित्रपाषाणजेन च ॥३७॥ इति मण्डपाः । समस्त मंडपो की पीठ के नीचे की जो भूमि है, वह रंग भूमि कही जाती है । वह बड़े लम्बे चौड़े पाषाणों से तथा अनेक प्रकार के चित्र विचित्र पाषाणों से बनाने चाहिए ॥३७॥ बलाणक का स्थान-- बलाणं देवगेहाग्रे राजद्वारे गृहे पुरे । जलाशयेऽथ कर्त्तव्यं सर्वेषां मुखमण्डपम् ॥३८॥ देवालय के द्वार के आगे तथा प्रवेश द्वारके ऊपर, राजमहल, गृह, नगर और जलाशय ( बावडी, तालाब आदि ) इन सब के द्वार के आगे मुखमंडप ( बलाणक ) किया जाता है ॥३८॥ बलाणक का मान-- जगतीपादविस्तीर्णं पादपादेन वर्जितम् । शालालिन्देन गर्भेण प्रासादेन समं भवेत् ॥३६॥ बलाणक का विस्तार जगती का चौथा भाग का अथवा चौथे का चौथा भाग न्यून, शाला और अलिंद के मान से, प्रासाद के गर्भमान के अथवा प्रासाद के मान के बराबर बनावे ॥३६॥ प्रासाद मे बलाणक का स्थान-- उत्तमे कन्यसं मध्ये मध्यं ज्येष्ठं तु कन्यसे । एकद्वित्रिचतुःपञ्च-रससप्तपदान्तरे ॥४०॥