प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तमोऽध्यायः १३५ ज्येष्ठमान के प्रासाद में कनिष्ठ मान का, मध्यममान के प्रासाद मे मध्यम मान का और कनिष्ठमान के प्रासाद मे ज्येष्ठमान का वलाणक किया जाता है। यह प्रासाद से एक, दो तीन, चार, पाच, छह अथवा सात पद के अन्तर से (दूर) बनाया जाता है *॥४०॥ मूलप्रासादवद् द्वारं मण्डपे च वलाणके । न्यूनाधिकं न कर्त्तव्यं दैर्घ्ये हस्ताङ्गुलाधिकम् ॥४१॥ मंडप का द्वार और वलाणक का द्वार मुख्य प्रासाद के द्वार के बराबर रखना चाहिये । यदि वढाने की आवश्यकता हो तो द्वार की ऊंचाई मे हस्तागुल (जितने हाथ का हो उतने अंगुल) बढ़ा सकते है। 'यह नीचे के भाग मे वढाना चाहिये, क्यों कि उत्तरंग तो सब समसूत्र मे रखा जाता है ऐसा शास्त्रीय कथन है ॥४१॥ उत्तरंग का पेटा भाग— पेटकं चोत्तरङ्गानां सर्वेषां समसूत्रतः । अङ्गणेन समं पेटं जगत्याश्चोत्तरङ्गजम् ॥४२॥ सब उत्तरंग का पेटा भाग (उत्तरंग के नीचे का भाग) समसूत्र मे रखना चाहिये और जगती के द्वार के उत्तरंग का पेटा भाग प्रासाद के आगन जगती के मथला बराबर रखना चाहिये ॥४२॥ पांच प्रकार के वालाणक— जगत्यग्रे चतुष्किका' वामन तद् वलाणकम् । वामे च दक्षिणे द्वारे वेदिकामत्तवारणम् ॥४३॥ जगती के आगे की चौकी के ऊपर जो वलाणक किया जाता है, वह वामन नामका वलाणक कहा जाता है। उसके बायी और दाहिनी ओर के द्वार पर वेदिका और मत्तवारण किया जाता है ॥४३॥ ऊर्ध्वा भूमिः प्रकर्त्तव्या नृत्यमण्डपसूत्रतः । मत्तवारणं वेदी च वितानं तोरणैर्युता ॥४४॥
- अपराजित पृच्छा सूत्र १२२ श्लोक १० मे एक से आठ पद के अंतरे भी बनाना लीखा है। १ 'चतुष्की या' ।