प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३६ प्रासादमण्डने बलाणक को ऊर्ध्वभूमि नृत्यमंडप के समसूत्र में रखनी चाहिये । तथा मत्तवारण, वेदी, वितान और तोरणों से शोभायमान बनानी चाहिए ॥४४॥ राजद्वारे बलाणे च पञ्च वा सप्तभूमिकाः । तद्विमानं बुधैः प्रोक्तं पुष्करं वारिमध्यतः ॥४५॥ राजद्वार के ऊपर जो पांच अथवा सात भूमिवाला बलाणक किया जाता है, उसको विद्वान् शिल्पी विमान अथवा उत्तुं ग नामका बलाणक कहते है । तथा जलाशय के बलाणक को पुष्कर नामका बलाणक कहते है ॥४५॥ हर्म्यशालो गृहे वापि कर्त्तव्यो गोपुराकृतिः । एकभूम्यास्त्रिभूम्यन्तं गृहाग्रद्वारमस्तके ॥४६॥ इति पंचबलाणकम् । गृहद्वार के आगे एक, दो अथवा तीन भूमिवाला जो बलाणक किया जाय, उसका नाम हर्म्यशाल है । वह गोपुराकृति वाला बनाया जाता है । (किले के द्वार के ऊपर जो बलाणक किया जाता है, उसको गोपुर नाम का बलाणक कहते है ) । कौन २ देव के आगे बलाणक करना— “शिवसूर्यो ब्रह्मविष्णू चण्डिका जिन एव च । एतेषा च सुराणा च कुर्यादग्रे बलाणकम् ॥” अप० सू० १२३ शिव, सूर्य, ब्रह्म, विष्णु, चंडिका और जिन, इन देवो के आगे बलाणक बनाना चाहिए । संवरणा— संवरणा प्रकर्त्तव्या प्रथमा पञ्चघण्टिका । चतुर्घण्टाभिवृद्धया च यावदेकोत्तरं शतम् ॥४७॥ मंडप आदि के ऊपर गुमटी के स्थान पर संवरणा की जाती है । प्रथम संवरणा पांच घंटी की है । आगे प्रत्येक संवरण की चार चार घंटी की वृद्धि से एक सौ घंटी तक बढाया जाता है ॥४७। पञ्चविंशति रित्युक्ताः प्रथमा वसुभागिका । वेदोत्तरं शतं यावद् वेदांशा वृद्धिरिष्यते ॥४८॥