भारतकोश
प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

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सप्तमोऽध्यायः १३७ उपरोक्त घंटिका की संख्यानुसार संवरणा पच्चीस प्रकार की हैं। उन में प्रथम संवरणा की भूमि का आठ आठ भाग करें। पीछे प्रत्येक संवरणा में चार चार भाग एक सौ चार भाग तक बढाने चाहिये ॥४८॥ भद्रार्धे रथिकार्धे च तवङ्गं वामदक्षिणे । अर्धोदयेन रथिका घण्टा कूटं तवङ्गकम् ॥४९॥ भद्राध की रथिकार्ध के मान का दोनो तरफ तवग बनावे । रथिका, घंटा, कूट और तवंग, ये विस्तार से आधा उदय मे रक्खें ॥४९॥ मूलघण्टा रथिका कूट १ पुष्पिका-नाम संवर्णा (१) घंटिका ५ कूट १६. सिंह ८. भाग प्रभातशङ्कर. ओ. सोमपुरा पुष्पिका नाम की प्रथम संवरणा प्रा० १६