प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तमोऽध्यायः १३६ प्रथम सवरणा सोलह कूट और पांच घंटाकलश वाली है। तथा कर्ण और उद्रुम के के ऊपर तल भाग के तुल्य ( आठ ) सिंह रक्खे । इस प्रकार अन्य संवरणा बनायी जाती है ॥५०॥ पच्चीस संवरणा के नाम— “पुष्पिका नन्दिनी चैव दशाक्षा देवसुन्दरी । कुलतिलका रम्या च उद्भिन्ना च नारायणी ॥ नलिका चम्पका चैव पद्माख्या च समुद्भवा । त्रिदशा देवगान्धारी रत्नगर्भा चूडामणिः ॥ हेमकूटा चित्रकूटा हिमाख्या गन्धमादिनी । मन्दरा मालिनी ख्याता कैलासा रत्नसम्भवा ॥ मेरु कूटोद्भवा ख्याताः संख्यया पञ्चविंशतिः ।” अप० सूत्र १६३ श्लोक २ से ५ पुष्पिका, नन्दिनी, दशाक्षा, देवसुन्दरी, कुलतिलका, रम्या, उद्भिन्ना, नारायणी, नलिका, चम्पका, पद्मा, समुद्भवा, त्रिदशा, देवगान्धारी, रत्नगर्भा, चूडामणि, हेमकूटा, चित्रकूटा, हिमाख्या, गन्धमादिनी, मन्दरा, मालिनी, कैलासा, रत्नसंभवा और मेरकूटा, ये ये पच्चीस संवरणा के नाम है । ज्ञानरत्नकोश नाम के ग्रन्थ मे बत्तीस संवरणा लिखा है। उनके नाम भी अन्य प्रकार के है। घंटिका की संख्या प्रासाद के मानानुसार लिखी है। जैसे—एक या दो हाथ के प्रासाद के ऊपर पांच घंटिका वाली संवरणा, तीन हाथ के प्रासाद के ऊपर नव, चार हाथ के प्रासाद के ऊपर तेरह, इस प्रकार पचास हाथ के प्रासाद के ऊपर एकसौ उनतीस घंटिका चढाना लोखा है। तथा घंटिकाओं की संख्यानुसार बत्तीस संवरणा के नाम लिखे है। जैसे—पाच घंटावाली पद्मिनी, नव घंटावाली मेदिनी, तेरह घंटावाली कलशा, इस प्रकार एकसौ उनतीस घंटावाली राजवर्द्धनी है। प्रथमा पुष्पिका संवरणा— “चतुरस्त्रीकृते क्षेत्रे अष्टधा प्रतिभाजिते । उच्छ्रयः स्याच्चतुर्भागेः सर्वांसामर्थोदयः ॥ मूलकूटोद्भवा. कर्णा द्विभागे. पृथग् विस्तरा । भागोदया विधातव्या. कूटा वै सर्वकामदाः ॥”