भारतकोश
प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

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पृष्ठ 195

१४६ प्रासादमण्डने यद्यथा स्थापितं वास्तु तत्तथैव हि कारयेत् । अव्यङ्गं चालितं वास्तु दारुणं कुरुते भयम् ॥१३॥ प्राचीन महापुरुषोंने जो वास्तु स्थापित किया है, उसका यदि जीर्णोद्धार किया जाय तो जैसा पहले हो वैसा ही करना चाहिये । जीर्ण वास्तु यदि अंगहीन न हुआ हो तो ऐसे वास्तु को चलायमान करने से बड़ा भयंकर भय उत्पन्न होता है ॥१३॥ अथ तच्चालयेत् प्राज्ञै–जीर्णं व्यङ्गं च दूषितम् । आचार्यशिल्पिभिः प्राज्ञैः शास्त्रदृष्ट्या समुद्धरेत् ॥१४॥ यदि प्राचीन वास्तु जीर्ण हो गया हो अथवा अंगहीन होकर दोषवाला हो गया हो तो उसका विद्वान् आचार्य और शिल्पियों की सलाह लेकर शास्त्रानुसार उद्धार करना चाहिये ॥१४॥ जीर्णवास्तु पातन विधि— स्वर्णजं रौप्यजं वापि कुर्यान्नागमथो वृषम् । तस्य शृङ्गेण दन्तेन पतितं पातयेत् सुधीः ॥१५॥ इति जीर्णोद्धार विधिः । जीर्णोद्धार के आरंभ के समय सोना अथवा चांदी का हाथी अथवा वृषभ बनावें । उस हाथी के दांत से अथवा वृषभ के शृंग से जीर्णवास्तु को गिरावे । उसके बाद बुद्धिमान शिल्पी सब गिरा देवें ॥१५॥ महादोष— मण्डलं जालकं चैव कीलकं सुषिरं तथा । छिद्रं सन्धिश्च काराश्च महादोषा इति स्मृताः ॥१६॥ देवालय में चूना उतर जाने से मंडलाकार लकीरे दीखती हों, मकड़ी के जाले लगे हों, कीले लगी हों, पोलाण हो गया हों, छिद्र पड़ गये हों, सांध दीख पड़ती हों और कारागृह बन गया हो, तो ये महादोष माने गये है ॥१६॥ शिल्पिकृत महादोष— “दिङ्मूढो नष्टछन्दश्च आयहीनः शिरोगुरुः । ज्ञेया दोषास्तु चत्वारः प्रासादाः कर्मदारुणाः ॥” अप० सू० ११०