भारतकोश
प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

पृष्ठ 196, कुल 278 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 196

ऽष्टमोऽध्यायः १४७ यदि प्रासाद दिङ्मूढ हो गया हो, नष्टछंद हो अर्थात् यथा स्थान प्रासाद के अंगोपांग न हो, आय हीन हो और ऊपर का भाग भारी व नीचे का पतला हो तो उन्हे प्रासाद के चार भयंकर महादोष शिल्पिंकृत माना हैं। भिन्न और अभिन्न दोष— - भिन्नदोषकरं यस्मात् प्रासादमठमन्दिरम् । मूषाभिर्जालकैद्वारै रश्मिवातैः प्रभेदितम् ॥१७॥ प्रासाद ( देवालय ), मठ (आश्रम) और मंदिर (गृह), इनका गर्भगृह यदि मूषा (लंबा अलिंद) से, जालियो से अथवा दरवाजे से आते हुए सूर्य की किरणो से वेधित होता हो तो भिन्न दोष माना जाता है ॥१७॥ अपराजितपृच्छा सूत्र ११० में कहा कि— "मूषाभिर्जालकैद्वारै-गर्भो यत्न न भिद्यते । अभिन्नं कथ्यते तच्च प्रासादो वेश्म वा मठः ॥" प्रासाद, गृह और मठ का गर्भगृह मूषा, जालि और द्वार से आते हुए सूर्य किरणों से